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विवाहित जीवन के विवाद

इस्लाम परिवार तथा कुटुंब व्यवास्था को बहुत अधिक भूमिका प्रदान करता है| दुसरे धर्म भी इस विषय पर अधिक ध्यान देते है, किन्तु इस्लाम इसको बहुत महत्त्व प्रदान करता है| एक मुस्लिम को यह शिक्षा दी जाती है की, वह अपने गैर मुस्लिम संबंधियों से भी उच्च व्यवहार करे| इतना ही नहीं, वह सम्बन्धी भी जो उससे घृणा करते है, उनसे भी उच्च व्यवहार करने की इस्लाम शिक्षा देता है|

विवाद के अनेक कारण हो सकते है, किन्तु वास्तव में विवाद तब होता है, जब कोई दुसरे के साथ दुर्व्यवहार करता है|

उदहारण के लिए, जब कोई अपना क्रोध किसी और पर निकालता है तथा उसके कारण आगे वाले के दिल को ठेस पहुंचती है|

विवाद अधिकतर उन लोगो से होता है, जिनसे हम अधिक मेल मिलाप रखते है – जैसे, परिवार के लोग, मित्र तथा सहयोगी आदि| विवाद के समय, वह लोग जो उनके मध्य सुलह कराने की क्षमता रखते हो, बहुत सोच समझकर, विवेचना तथा विनम्रता से आपस में सुलह कराने का प्रयत्न करना चाहिए| यदि ऐसा न किया तो, वह लोग (जिनके मध्य विवाद हुआ हो) हमेशा के लिए एक दूसरे से दूर हो जायेंगे|      

दो लोग जिनके मध्य विवाद हो, यदि उनमें सुलह करा दी जाये तो उसका बहुत बड़ा पुण्य प्राप्त होगा|

अबू दर्दा रज़िअल्लाहुअन्हु ने उल्लेख किया: अल्लाह के रसूल मुहम्मद ने कहा: “क्या मै तुम लोगो को वह बात बताऊ, जो उपवास, नमाज़ तथा दान (सदखा) से उच्च हो?” लोगो ने कहा: ‘हाँ, अल्लाह के रसूल !” आप ने कहा: “लोगो के मध्य सुलह कराना, बिगाड़ना विनाशकारक है|” (सुनन अबी दावूद:4919) [1] [2]

विषय सूची

 

इस्लामी शिक्षण

कुरआन तथा सुन्नत में इसकी प्राधान्यता से पता चलता है कि, इस्लाम ने इस विषय को कितनी गंभीरता से ली है| इस्लाम के मुख्य उद्देश्य में यह भी एक है की, लोगो में अच्छे सम्बन्ध हो| इससे समाज में उन्नति होती है|

अल्लाह ने कुरआन में कहा: “और जो ऐसे हैं कि अल्लाह नॆ जिसे जोड़ने का आदेश दिया है उसे जोड़ते हैं और अपनॆ रब से डरते रहते हैं और बुरॆ हिसाब का उन्हॆं डर लगा रहता है।“ (कुरआन, सूरा राद, 13:21)   

अल्लाह के रसूल की सुन्नत से यह पता चलता है कि, सम्बन्ध तोड़ने के विरुध्ध कड़ी चेतावनी दी गयी है| अबू हुरैरह रज़िअल्लाहुअन्हु ने उल्लेख किया कि, आप ने ऐसा कहा: जब अल्लाह ने इस सृष्टि को बनाया, तब सम्बन्ध (नाता) आकर अल्लाह के आगे खड़ा हो गया और कहने लगा, ‘मुझे (सम्बन्ध) काटे (तोड़े) जाने से मै तेरी शरण में आता हूँ|’ अल्लाह ने कहा: ‘क्या तू प्रसन्न होगा, यदि मै उन लोगो कि रक्षा करू, जो तेरी (सम्बन्ध की) रक्षा करते है तथा जो सम्बन्ध काटते (तोड़ते) है, उन्हें मै भी काट (तोड) दू?’ तब उसने (सम्बन्ध) ने कहा, ‘हाँ, अवश्य|’ अल्लाह ने कहा, ‘तुम्हारी दुआ स्वीकार की गयी|’”

फिर अल्लाह के रसूल ने कहा: “यदि तुम उल्टे फिर गए तो क्या तुम इससे निकट हो कि धरती में बिगाड़ पैदा करो और अपने नातों-रिश्तों को काट डालो?ये वे लोग हैं जिनपर अल्लाह ने लानत की और उन्हें बहरा और उनकी आँखों को अन्धा कर दिया।तो क्या वे क़ुरआन में सोच-विचार नहीं करते या उनके दिलों पर ताले लगे हैं?” (कुरआन, सूरा मुहम्मद, 47:22-24) [सहीह बुखारी:5987 & सहीह मुस्लिम:2554]

अल्लाह के रसूल ने कहा:“संबंधो कि रक्षा करने वाला वह नहीं, जिससे उसके सम्बन्धी अच्छा व्यवहार करे, उसका रक्षक तो वह है, जिसके सम्बन्धी उससे कट जाए, किन्तु वह उनसे सम्बन्ध जोड़े रखे|” (सहीह बुखारी:5991)

इस्लाम इतनी उच्च शिक्षा देता है| [3]

विवाद के कुछ कारण, धन

पति पत्नी में विवाद के अनेक कारण होते है, किन्तु अधिकतर धन के कारण ही होते है| इसका समाधान यह है कि, आपास में बात चीत से, इसे हल किया जा सकता है|

उदहारण के लिए पत्नी का बाहर काम करना विवाद का कारण बन सकता है| इसलिए ऐसे विषय विवाह से पहले ही बात करनी चाहिए| यदि पति मान भी जाए तो, यह बात होनी चाहिए कि, क्या उसकी कमाई का कुछ भाग वह घर पर खर्च करेगी या अपने स्वयं के लिए रख लेगी|

यदि इन विषय से बचना हो तो, पहले ही आपस में बैठ कर सहमति बना लेनी चाहिए| जैसे कि – घर की आमदनी क्या है और उसके प्रकार उसका खर्चा भी तय कर लेना चाहिए|

पालन पोषण (परवरिश)

बच्चो के परवरिश के विषय में भी आपस में विवाद हो सकता है| इसी लिए संतान से पहले इस्लामी परवरिश का ज्ञान होना चाहिए|   

तनाव, दबाव

यह तो हर एक का विषय है| इसमें मुस्लिम लोग भी है| काम का तनाव घर पर प्रभाव डालता है|

इसके लिए दोनों पति पत्नी मिलकर हल निकालना चाहिए| दोनों एक दूसरे के दिन भर के काम के बारे में आपस में बात करे, आपस में एक दूसरे को तसल्ली दे, प्रोत्साहित करे| नमाज़ के लिए दोनों मिलकर मस्जिद जाए| हो सके तो मिलकर कुरआन पढ़े| हलाल (वैध) प्रकार से जो भी हो सकता उसे करे|

पारिवारिक (घरेलू) हिंसा

इस विषय में जब तक दोनों ओर के लोग उचित प्रकार से स्थिति को न संभाले यह विषय गंभीर बन जाता है| यदि पारिवारिक हिंसा को न रोका जाए तो, उसका प्रभाव पति पत्नी पर ही नहीं, उनकी संतान पर भी पड़ता है|

आध्यात्मिक असामंजस्य

यह समस्या संसार में हर जगह पायी जाती है| मुस्लिम लोग सारे संसार में फैले हुए है तथा इनके मध्य इस्लाम की सोच के बारे में मतभेद है|     

वैवाहिक सम्बन्ध दुष्क्रिय होना (लैंगिक सम्बन्ध ह होना)

इस समस्या के बारे में बहुत कम बात किया जाता है, परन्तु अनेक परिवार के टूटने का कारण यही है| कई पति पत्नी को लैंगिक सम्बन्ध में इस्लामी विचार धारा का ज्ञान ही नहीं है| अतः जब भी दोनों में कोई इस विषय में असंतृप्त हो तो, या दुसरे राह ढूँढ़ते है या जुदा हो जाते है, इसके हल की परवाह ही नहीं करते|

दोनों को इस विषय में सबर (धीरज) से समाधान ढूँढना चाहिए| यदि धीरज खोदेंगे तो उसका अंजाम बुरा होगा| इस विषय में ज्ञान, अभ्यास तथा किसी बुध्दिमान आलिम (विद्वाम्स) की सलाह की आवश्यक है|

परिवार चलाने की क्षमता न होना   

लडकियों को डाक्टर, इन्जिनीर, वैज्ञानिक बनाने की ओर प्रयास किया जा रहा है, किन्तु घर ग्रहस्ती संभालने के विषय में ज्ञान नहीं दिया जा रहा है| इस्लाम स्त्री को उच्च विद्या प्राप्त करने से या नौकरी (इस्लामी दिशा निर्देश के अनुसार) करने से कभी नहीं रोकता| किन्तु स्त्री का पहला धर्म यह होता है कि, वह घर ग्रहस्ती संभाले - पत्नी तथा माँ के रूप में| यदि पत्नी बाहर काम करती हो तो, पति को चाहिए कि, वह उसके घर के काम में सहायता करे, क्यों कि पत्नी भी एक इन्सान है, जिसे आराम की आवश्यकता होती है| इस तरह आपस में एक दूसरे की सहायता करते रहे, तो परिवार में शांति तथा जीवन में सुख प्राप्त होता है|

निष्कर्ष

अंत में हम मुहम्मद के कर्म पर नज़र डालेंगे| इससे हमें यह पता चलेगा कि, आप किस तरह दो गुटों के मध्य सुलह कराते थे|

  1. आप दोनों पक्ष की बात सुनने के पश्चात ही फैसला किया करते थे|
  2. यदि ग़लती करने वाला पश्चात्ताप करे तो आप उसके अच्छे गुण तथा उच्च व्यवहार को बताया करते थे|
  3. जिस पर अत्याचार हुआ है, चाहे वह उम्र में छोटा हो, फिर भी उसे अपनी बात रखने का मौका देते|
  4. आप कभी, जिस पर आत्याचार हुआ हो, उसे धीरज (सब्र) के नाम पर चुप रहने को न कहते, न ही अत्याचार करने वाले को अन्याय करने की छूट देते| आप तो अत्याचार तथा अन्याय को रोकते तथा अत्याचार ग्रस्त को अपनी रक्षा कराते|

अनस इब्न मालिक रज़िअल्लाहुअन्हु ने कहा: अल्लाह के रसूल ने कहा: “आपस में बात चीत न रोकना, आपस में द्वेष को न व्यापित करना, दूसरो से ईर्ष्या न करना, किन्तु सब आपस में अल्लाह दास बनकर मिल्झुल कर रहो| एक मुस्लिम (विश्वासी) दूसरे मुस्लिम से तीन दिन से अधिक बात न करना निशेधित (अवैध) है|” (सहीह बुखारी:6065 & सहीह मुस्लिम:2558) [4]      

 

आधार

[1]http://www.thekhalids.org/index.php/newsletter-archive/991-how-prophet-sas-resolved-disputes(english)

[2]http://www.siasat.com/news/how-prophet-muhammad-resolved-disputes-736051/(english)

[3]https://islamqa.info/en/93506(english)

[4]http://www.siasat.com/news/how-prophet-muhammad-resolved-disputes-736051/(english)

 

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