Send an article  |  Print   |  ../file-system/small/pdf   |   RSS   |  

फसाद

धरती पर अराचकता तथा अशांति फैलाने को फसाद कहा जाता है| इस्लाम धर्म शांति कि स्थापना चाहता है तथा समाज में सब की सुरक्षा की कामना करने वाला धर्म है|

विषय सूची

शाब्दिक अर्थ

अराचकता, अनैतिकता, अशांति, भ्रष्ट आदि| [1]

कुरआन

कुरआन में फसाद (अराचकता) न फैलाने पर अनेक आयते है, उदाहरण के लिये:

  1. औरजबउनसेकहाजाताहैकि"ज़मीनमेंबिगाड़पैदानकरो", तो कहते हैं, "हम तो केवल सुधारक हैं।"(कुरआन सूरा बखरह, 2:11)

  2. जोअल्लाहकीप्रतिज्ञाकोउसेसुदृढ़करनेकेपश्चातभंगकरदेतेहैंऔरजिसेअल्लाहनेजोड़नेकाआदेशदियाहैउसेकाटडालतेहैं, और ज़मीन में बिगाड़ पैदा करते हैं, वही हैं जो घाटे में हैं। (कुरआन सूरा बखरह, 2:27)
  3. औरयादकरोजबतुम्हारेरबनेफ़रिश्तोंसेकहाकि"मैंधरतीमें(मनुष्य को) ख़लीफ़ा (सत्ताधारी) बनानेवाला हूँ।" उन्होंने कहा, "क्या उसमें उसको रखेगा, जो उसमें बिगाड़ पैदा करे और रक्तपात करे और हम तेरा गुणगान करते और तुझे पवित्र कहते हैं?" उसने कहा, "मैं जानता हूँ जो तुम नहीं जानते।"(कुरआन सूरा बखरह, 2:30)
  4. औरजबवहलौटता है तो धरती में इसलिए दौड़-धूप करता है कि इसमें बिगाड़ पैदा करे और खेती और नस्ल को तबाह करे, जबकि अल्लाह बिगाड़ को पसन्द नहीं करता। (कुरआन सूरा बखरह, 2:205)
  5. इसीकारणहमनेइसराईलकीसन्तानकेलिएलिखदियाथाकिजिसनेकिसीव्यक्तिकोकिसीकेख़ूनकाबदलालेनेयाधरतीमेंफ़सादफैलाने के अतिरिक्त किसी और कारण से मार डाला तो मानो उसने सारे ही इनसानों की हत्या कर डाली। और जिसने उसे जीवन प्रदान किया, उसने मानो सारे इनसानों को जीवन दान किया। उनके पास हमारे रसूल स्पष्ट प्रमाण ला चुके हैं, फिर भी उनमें बहुत-से लोग धरती में ज़्यादतियाँ करनेवाले ही हैं।(कुरआन सूरा माइदा, 5:32)

हदीस

मुआज़ इब्न जबल रज़िअल्लाहुअन्हु ने उल्लेख किया: रसूलुल्लाह ने कहा: लडाई के दो प्रकार है: जो अल्लाह की प्रसन्नता चाहता है, वह अपने नायक की विधेयता करता है, अपनी धन दौलत निछावर करता है, अपने साथियो का सत्कार करता है, धरती पर आराचकता नहीं फैलाता – उसे हर समय प्रतिफल मिलता है (चाहे सोते रहे या जागते रहे); किन्तु जो दिखावे के लिए लड़ता है, ताके लोग उसकी प्रशंसा करे तथा अपने नायक कि अविधेयता करता है, धरती में अशांति उत्पन्न करता है – उसे कुछ प्रतिफल प्राप्त नहीं होता| (सुनन अबी दावूद:2515)

अबू ज़र रज़िअल्लाहुअन्हु ने उल्लेख किया: मैंने पूछा, अल्लाह के रसूल , सबसे उत्तम कर्म क्या है? आप ने उत्तर दिया: अल्लाह पर विश्वास (ईमान) रखना तथा उसके मार्ग में युध्ध करना| मैंने फिर पूछा, किस दास कि मुक्ति भली होगी? आप ने कहा:जो अपने मालिक के लिए मूल्यवान हो तथा जिसकी कीमत अधिक हो| मैंने कहा, यदि मै न कर पाया तो? आप ने कहा: किसी शिल्पकार की सहायता करो या किसी अकुशल व्यक्ति के लिए कुछ बना दो| मैंने कहा, अल्लाह के रसूल , आप जानते है कि, मै यह सब नहीं कर पाता हूँ| आप ने उत्तर दिया: धरती पर अराचकता फैलाने से बचो, यही तुम्हारा दान है| (सहीह मुस्लिम:84)

 

अराचकता तथा अशांति को समाप्य करना

 मानव बहुत भुलक्कड़ (भूलने वाला) होता है तथा अनेक गलतिया करता है| उसे स्वयं उसका मन (नफ्स) तथा शैतान गलती करने पर प्रोत्साहित करते है| जब कभी भी शरीर अनारोग्य हो जाता है तो, वैद्य (doctor) उसे ठीक करने के लिए कुछ दवा (औशधि) देता है, जिससे उसका शरीर ठीक होता है| इसी तरह इन्सान का मन (दिल) भी रोग ग्रस्त (बीमार) होता है| जैसे उसे प्रापंचिक कामनाये तथा धर्म में संदेह उत्पन्न होते है, जिसे अल्लाह ने निषेधित किया है| तब इन्सान हत्या, अनैतिक लैंगिक संपर्क, मद्यपान सेवन करना, लोगो पर अत्याचार करना, लोगो का धन छीन लेना तथा लोगो को अल्लाह के मार्ग से रोकना इत्यादि कुकर्म करने लगता है| स्वयं भी अल्लाह की अवज्ञा करता है|

दिल कि बीमारी (मनोवैज्ञानिक तथा आध्यात्मिक) शारीरिक रोग से बड़ा हानिकारक रोग है| इसके के उपचार के लिए इस विषय में अनुभवी चिकित्सक की आवश्यकता है| इस तरह के रोग के लिए अल्लाह ने यह उपाय बताया कि,समाज में भलाई को फैलाये तथा बुराई को समाप्त करे| अल्लाह कुरआन में कहता है:"और तुम्हें एक ऐसे समुदाय का रूप धारण कर लेना चाहिए जो नेकी की ओर बुलाए और भलाई का आदेश दे और बुराई से रोके। यही सफलता प्राप्त करनेवाले लोग हैं।“ (कुरआन सूरा आले इमरान 3:104)  

भलाई कि और लोगो को बुलाना तथा बुराई से रोकना सबसे अच्चे कर्म में से है तथा प्रमुख इस्लामी कार्य है| नबी तथा रसूल यही सन्देश लेकर आये थे| अल्लाह ने कुरआन में कहा:"रसूल शुभ समाचार देनेवाले और सचेत करनेवाले बनाकर भेजे गए हैं, ताकि रसूलों के पश्चात लोगों के पास अल्लाह के मुक़ाबले में (अपने निर्दोष होने का) कोई तर्क न रहे। अल्लाह अत्यन्त प्रभुत्वशाली, तत्वदर्शी है।“ (कुरआन सूरा निसा 4:165)

कुरआन में अल्लाह ने इस तरह कहा: “तुम एक उत्तम समुदाय हो, जो लोगों के समक्ष लाया गया है। तुम नेकी का हुक्म देते हो और बुराई से रोकते हो और अल्लाह पर ईमान रखते हो। और यदि किताबवाले भी ईमान लाते तो उनके लिए यह अच्छा होता। उनमें ईमानवाले भी हैं, किन्तु उनमें अधिकतर लोग अवज्ञाकारी ही हैं।“ (कुरआन सूरा आले इमरान 3:110)

 

यदिसमाज में बुराई को रोका न जाये या भलाई को प्रचार न किया जाए तो अल्लाह का शाप (अज़ाब) अवश्य आएगा| अल्लाह ने इस्राईल के संतान को शाप दिया, क्यों कि वह इस प्रमुख कार्य को नहीं किया| अल्लाह ने इस विषय में कुरआन में कहा: “इसराईल की सन्तान में से जिन लोगों ने इनकार किया, उनपर दाऊद और मरयम के बेटे ईसा की ज़बान से फिटकार पड़ी, क्योंकि उन्होंने अवज्ञा की और वे हद से आगे बढ़े जा रहे थे। जो बुरा काम वे करते थे, उससे वे एक-दूसरे को रोकते न थे। निश्चय ही बहुत ही बुरा था, जो वे कर रहे थे।“ (कुरआन सूरा माइदा, 5:78,79)

बुराई से रोकना तथा भलाई की और लोगो को बुलाना बहुत धैर्य का काम है, इसमें अनेक प्रकार की बाधाये आती है, परन्तु अल्लाह की प्रसन्नता के लिए इन्हें झेलना चाहिए| कुरआन में लुखमान ने अपने पुत्र से इस तरह कहा: "ऐ मेरे बेटे! नमाज़ का आयोजन कर और भलाई का हुक्म दे और बुराई से रोक और जो मुसीबत भी तुझपर पड़े उसपर धैर्य से काम ले। निस्संदेह ये उन कामों में से है जो अनिवार्य और दृढ़संकल्प के काम हैं।“ (कुरआन सूरा लुखमान, 31:17)

कुरआन में अल्लाह ने इस तरह कहा: “अपने रब के मार्ग की ओर तत्वदर्शिता और सदुपदेश के साथ बुलाओ और उनसे ऐसे ढंग से वाद-विवाद करो जो उत्तम हो। तुम्हारा रब उसे भली-भाँति जानता है जो उसके मार्ग से भटक गया और वह उन्हें भी भली-भाँति जानता है जो मार्ग पर हैं।“ (कुरआन सूरा नहल, 16:125)

कुरआन में कहा गया: “अल्लाह अवश्य उसकी सहायता करेगा, जो उसकी सहायता करेगा - निश्चय ही अल्लाह बड़ा बलवान, प्रभुत्वशाली है।ये वे लोग हैं कि यदि धरती में हम उन्हें सत्ता प्रदान करें तो वे नमाज़ का आयोजन करेंगे और ज़कात देंगे और भलाई का आदेश करेंगे और बुराई से रोकेंगे। और सब मामलों का अन्तिम परिणाम अल्लाह ही के हाथ में है।“ (कुरआन सूरा हज्ज, 22:40-41)

बुराई से रोकना तथा भलाई की और लोगो को आमंत्रित करना, यह कभी न समाप्त होने वाला कार्य है, यह प्रलय (अंतिम दिन) तक चलता रहेगा| यह समाज (मुस्लिम जाती) के हर व्यक्ति पर अनिवार्य है| चाहे वह राजा हो या प्रजा, पुरुष हो या स्त्री आदि| अल्लाह के रसूल (ईशदूत) मुहम्मद ने कहा: “जो भी किसी पाप कार्य को देखे तो वह अपने हाथ से रोकने का प्रयास करे; यदि संभव न हो तो जुबान से रोकने का प्रयास करे; यदि यह भी संभव न हो तो, कम से कम मन में उसे बुरा जाने – यह विश्वास कि कमज़ोर कड़ी है|” (सहीह मुस्लिम:49)

मुस्लिम जाती समाज में सुधार का प्रयास करने वाली जाती है| वह समाज की गन्दगी को साफ़ करने का कार्य करे| सारी मानवजाति को भलाई का सन्देश दे| यह उसका कर्तव्य है| रसूलुल्लाह ने कहा: “धर्म सच्चाई (ईमानदारी) का नाम है|” लोगो ने पूछा,”किसके लिए?” आप ने कहा, “अल्लाह के लिए, उसके ग्रन्थ के लिए, उसके नबी के लिए, मुस्लिम जाती के राजा तथा प्रजा के लिए|” (सहीह मुस्लिम:95)

यदि अल्लाह किसी विषय का आदेश दे तो उसे पहले पालन करने वाला मुस्लिम (विश्वासी) हो, अल्लाह किसी विषय से मना करे, तो तुरंत उससे रुकने वाला भी मुस्लिम (विश्वासी) ही हो| अल्लाह ने कुरआन में कहा: “ऐ ईमान लानेवालो! तुम वह बात क्यों कहते हो जो करते नहीं?अल्लाह के यहाँ यह अत्यन्त अप्रिय बात है कि तुम वह बात कहो, जो करो नहीं।“ (कुरआन सूरा सफ्फ, 61:2-3)

चाहे इन्सान कितना भी उच्च क्यों न हो- उसे कुरआन एवं सुन्नत की रौशनी में सलाह, मार्गदर्शन तथा याद दिहनी की आवश्यक होती है| कुरआन में कहा गया: “ऐ नबी! अल्लाह का डर रखना और इनकार करनेवालों और कपटाचारियों का कहना न मानना। वास्तव में अल्लाह सर्वज्ञ, तत्वदर्शी है।“ (कुरआन सूरा अहज़ाब, 33:1)

यदि हमें अल्लाह की प्रसन्नता तथा स्वर्ग पाना हो तो, भालायी का प्रचार करे एवं बुराई से रुके और रोके| [2]

  आधार

[1]http://www.almaany.com/en/dict/ar-en/%D9%81%D8%B3%D8%A7%D8%AF/(english)

[2]https://islamqa.info/en/11403(english)

 

16 Views
Correct us and Correct yourself
.
Comments
Top of page