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अपवाद, निंदा

इस्लाम धर्म में किसी पर अपवाद डालना, बड़ा पाप (अपराध) माना जाता है| अपने साथी (स्त्री या पुरुष) के बारे में उनकी अनुपस्थिति में असत्य विषय का कहना (फैलाना), इसे अपवाद या निंदा कहा जाता है| [1]

सूची

पारिभाषिक अर्थ

कलंक [2]

 

इस्लामी अर्थ

इस संसार तथा परलोक में यातना अथवा दंड का कारण प्रमुख (बड़े) पाप होते है|

सबसे बड़े अपराध वह है, जो मानवता को हानि पहुंचाते है| उनमे प्रमुख चुगली (अनुपस्थिति में निंदा डालना) तथा अपवाद है| इन दो विषय को अल्लाह ने अवैध इसलिए किया कि, इससे समाज में, परिवार में, सम्बन्धियों में, पड़ोसियों में दूरी बडती है तथा इन्सान भलाई से दूर तथा बुराई के करीब जाता है|

इन घोर अपराध को करने वाला बहुर बुरी मौत मारा जाता है|

 

कुरआन

अल्लाह ने कुरआन में कहा: “ऐ ईमान लानेवालो! बहुत से गुमानों से बचो, क्योंकि कतिपय गुमान गुनाह होते हैं। और न टोह में पड़ो और न तुममें से कोई किसी की पीठ पीछे निन्दा करे - क्या तुममें से कोई इसको पसन्द करेगा कि वह मरे हुए भाई का मांस खाए? वह तो तुम्हें अप्रिय होगा ही। - और अल्लाह का डर रखो। निश्चय ही अल्लाह तौबा क़बूल करनेवाला, अत्यन्त दयावान है।“ (कुरआन, सूरा हुजुरात, 49:12)

 

हदीस

अल्लाह के रसूल ने कहा: “तुम्हे पता है चुगली किसे कहते है?” लोगो ने कहा, “अल्लाह और उसके रसूल बेहतर जानते है|” आप ने कहा, “अपने भाई के बारे में (उसकी अनुपस्थिति में) वह कहना जो वह पसंद नहीं करता|” लोगो ने पूछा, “यदि जो कहां जा रहा है, वह सत्य हो तो?” आप ने कहा, “यदि तुम जो कह रहे हो वह सत्य हो तो तुम उसकी चुगली कर रहे हो तथा यदि वह असत्य हो तो, तुम उस पर अपवाद, कलंक लगा रहे हो|” (सहीह मुस्लिम:2589)

अतः अपवाद लगाना चुगली से बड़ा पाप है| क्यों कि इससे तुम अपने भाई के बारे में असत्य कह रहे हो तथा उसे अपमान कर रहे हो|     

अल्लाह के रसूल ने कहा: “...जो भी जानते बूझते बेकार की तर्क (बहस) करता है, जब तक वह उससे रुक न जाए, अल्लाह उससे क्रोधित रहता है, जो भी किसी विश्वासी के बारे में वह कहे जो उसमे न हो तो, जब तक वह उसे छोड़ न दे, अल्लाह उसे नरक की आग के घर में रखेगा|” (अबू दावूद, अल हाकिम आदि) [1]

 

इस्लाम शांति का धर्म है

 

इस्लाम शांति, प्रेम तथा सद्भावना का धर्म है| झूठ, संदेह (शक), चुगली (गीबत), अपवाद (कलंक) तथा प्रलाप (अफवाह) जैसे विषय को इस्लाम में कोई स्थान नहीं, इस्लाम इन विषय को निषेध करता है| इस्लाम इन विषय को महा पाप घोषित करता है| इन विषय के कारण समाज में शत्रुता, कलह का जन्म होता है, अतः समाज नष्ट हो जाता है| इससे परिवार में, पड़ोसियों के मध्य, मित्र तथा सम्न्बंधियो में विद्वेष जन्म लेता है|

मनुष्य का समबन्ध मानवता से शुध्ध तथा निष्ठावान होना चाहिए, इस्लाम इसी की शिक्षा देता है| हम दूसरों की मर्यादा, प्रतिष्ठा अथवा गोपनीयता का ध्यान रखे| इस्लाम की शिक्षा है कि, हम केवल अपने कर्म के ज़िम्मेदार ही नहीं, बलके जिन विषय में हमारा प्रभाव समाज पर है, उन विषय में भी हम उत्तरदायी है|     

 

हम में अनेक बिना सोच विचार के गपशप करते है| हमारा  विचार है कि, यह छोटी बात है| हम जिस विषय को मामूली (छोटा) समझते है, वह अल्लाह कि दृष्टी में बड़ा हो सकता है!

अल्लाह अपवाद के विरुध्ध आवाज़ उठाने तथा उसे समाप्त करने कि शिक्षा देता है|

“और ऐसा क्यों न हुआ कि जब तुमने उसे सुना था तो कह देते, "हमारे लिए उचित नहीं कि हम ऐसी बात ज़बान पर लाएँ। महान और उच्च है तू (अल्लाह)! यह तो एक बड़ी तोहमत है?"(कुरआन, सूरा नूर, 24:16)

 

लोग तो सुनी हुई बात बिना सोच विचार के, उसकी प्रमाणता को जाने बिना व्यापित (फैलाते) करते चले जाते है| ऐसा करना उचित नहीं है|

“मेरे बन्दों से कह दो कि "बात वही कहें जो उत्तम हो। शैतान तो उनके बीच उकसाकर फ़साद डालता रहता है। निस्संदेह शैतान मनुष्य का प्रत्यक्ष शत्रु है।" (कुरआन, सूरा इस्रा, 17:53)

हमें अपने शरीर के अंग को अल्लाह कि  आराधना के लिए उपयोग करना चाहिए तथा अपनी ज़बान को पाप (गुनाह) से सुरक्षित रखना चाहिए| अल्लाह के रसूल (ईशदूत) मुहम्मद ने उपदेश दिया: “जो व्यक्ति अपनी ज़बान को अवैध प्रलाप से तथा अपने गुप्तांग को अनैतिक लैंगिक संपर्क से सुरक्षित रखता हो, मै आश्वासन देता हूँ कि, वह स्वर्ग में प्रवेश करेगा|” (सहीह बुखारी, सहीह मुस्लिम) [3]   

 

अपवादी का दंड

 

जिस व्यक्ति ने किसी पर व्यभिचार का आरोप लगाया हो, यदि वह उसे चार साक्ष से प्रमाणित न कर पाए तो, उसे 80 कोड़े मारे जाए| क्यों कि अल्लाह ने कुरआन में कहा है: “और जो लोग शरीफ़ और पाकदामन स्त्री पर तोहमत लगाएँ, फिर चार गवाह न लाएँ, उन्हें अस्सी कोड़े मारो और उनकी गवाही कभी भी स्वीकार न करो - वही हैं जो अवज्ञाकारी हैं।“ (कुरआन, सूरा नूर, 24:4)

अपवाद (आरोप) में प्रयोग होने वाले शब्द दो प्रकार के होते है – प्रत्यक्ष, अप्रत्यक्ष|

किसी पर स्पष्ट रूप से आरोप लगाने को प्रत्यक्ष कहते है|

एवं अस्पष्ट रूप से आरोप लगाने को अप्रत्यक्ष कहते है|

प्रत्यक्ष रूप से आरोप लगाने पर, आरोपी को वही दंड दिया जाये जो नियमित है| यदि आरोपी अप्रत्यक्ष रूप से आरोप लगाये तो, आरोपी से पूछना चाहिए कि, उसका उद्देश्य क्या है? यदि वह गलत संकल्प से आरोप न लगाए तो, उसे केवल चेतावनी दी जाए| [4]   

 

भलाई की ओर बुलाने वालो (दाई) की निंदा करना

 

कई दाई अन्य दाईयो के बारे में बुरा भला कहते है| या तो वह गुप्त रूप से करते है या कभी सार्वजनिक रूप से ऐसा करते है| ऐसा करना अल्लाह के निर्देश के विरुध्ध है:   

1.  यह मुस्लिम (विश्वासी) लोगो के अधिकार के विरुध्ध है| प्रत्येकता से वह लोग, जो ज्ञानी, पंडित (उलमा) है, क्यों कि वह लोगो को वास्तविक धर्म के विषय बताते है, उनकी उपासना को सही करते है, उनके लिए लाभदायक पुस्तक लिखते है|

2.  इससे मुस्लिम लोगो में भेद उत्पन्न होता है| मुस्लिम लोगो के मध्य एकता की अधिक आवश्यकता है| इस तरह करने से जो लोग धर्म का सही पालन कर रहे है तथा लोगो को धर्म का सही पालन करने का मार्ग बता रहे है, उनके दावती काम (भलाई की और लोगो को बुलाना) में रुकावट, बाधा पड़ती है| इस तरह मुस्लिम लोगो के शत्रु को हम एक मौका दे रहे है, कि वह लोगो को इस्लाम से दूर करे तथा समाज में अशांति का वातावरण उत्पन्न करे|

3.  जो लोग दाईयो के मध्य भेद डालना चाहते है, ऐसा करने से उन्हें मदद मिलती है| इस तरह के कर्म करने वाले इस्लामी भाई के विरुध्ध उनके शत्रु की मदद कर रहे है|

4.  इसके द्वारा साधारण तथा अभिजात वर्ग के लोगो की बुध्धि को भ्रष्ट कर देता है; समाज में असत्य तथा अफवाह जन्म लेती है, परिणाम स्वरूप अपवाद अथवा कलंक व्यापित होता है| इससे समाज में अराचकता फैलाने वालो को एक अवसर मिलता है कि, वह विश्वासियो (मुस्लिमो) के बारे में अफवाह फैलाये तथा उन्हें हानि पहुंचाए|

5.  इन आरोप में अक्सर सत्य नहीं होता| यह शैतान द्वारा डाले गए विचार होते है| इससे शैतान इन्सान को आकर्षित करना चाहता है|

6.  यदि किस व्यक्ति पर कुछ संदेह हो तो, प्रत्यक्ष रूप से उस व्यक्ति से बात करे और अपना संदेह दूर करे| ऐसा करने से विश्वासियो के मध्य कोई भेद भाव उत्पन्न न होगा तथा शैतान अथवा उसके अनुयायियो को असत्य आरोप लगाने का अवसर न मिलेगा| यदि किसी में कुछ कमी पायी भी जाए तो उसे एकांत में बताकर सुधारने का प्रयत्न करना चाहिए, सार्वजनिक रूप से ऐसा करने से लोगो में भ्रम उत्पन्न होता है तथा आप जिसको सुधारना चाहते है, वह अवमानित महसूस करता है| इसलिए ऐसा करना बिलकुल उचित नहीं है|

 

आधार

[1]https://www.kalamullah.com/three.html(english)

 

[2]http://www.islamawareness.net/Backbiting/prohibits.html(english)

 

[3]http://www.islamweb.net/en/article/92753/(english)

 

[4]https://islamqa.info/en/121059(english)

 

[5]https://islamqa.info/en/21576(english)

 

     

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