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अपनी लाभदायक आयु(उम्र) कैसे बढायें (वृध्धि करे)?

इसमें संक्षिप्त के साथ ऐसे सुकर्म का उल्लेख किया गया है, जिनका प्रतिफल देखने वाले के हिसाब से आप की आयु में वृध्धि करेगा|ताकि सुकर्म से भर पूर आप की लाभ दायक आयु आप की निश्चित आयु से बड़ी हो| यह लेख एक सूक्ष्म दर्शक यंत्र जैसा है| जो हमारे सामने बहुत ऐसी हदीसों की श्रेष्ठता बताता है, जिन्हें हम बिना ध्यान दिए कभी कभार पढ़कर गुज़र जाते है|

इस लेख में तीन अध्याय है :

पहला अध्याय : आयु लम्बी करने की महत्व तथा अर्थ

दूसरा अध्याय : आयु को लम्बी करने वाले कार्य

तीसरा अध्याय : सुकर्म में भरपूर लाभदायक उम्र की सुरक्षा का तरीका

विषय सूची

आप क्यों जीवित रहना चाहते है ?

हमारे जीवन का उद्देश्य केवल खाना पीना नहीं है, यदि ऐसा होता तो हम अविश्वासियो और जानवरों के समान है|क्यों कि उनका सांसारिक जीवन का उद्देश्य मात्र खाना पीना और इस संसार के स्वाद, रस तथा आनंद लेना है| अल्लाह ताला ने इनकी निंदा करते हुए फ़रमाया है : “निःसंदेह अल्लाह प्रवेश देगा उनको जो ईमान लाये तथा सदाचार किये ऐसे स्वर्गों में जिन में नहरे बहती होंगी| तथा जो काफिर हो गए वह आनंद लेते तथा खाते है जैसे पशु खाते है| और अग्नि उनका आवास (स्थान) है|” [खुरआन सूरा मुहम्मद 47:12]

हमारे अस्तित्व और जीवन का उद्देश्य अल्लाह की उपासना करना और शैतान एवं बुरी इच्छाओं की अविधेयता करना है| व्यापारिकदृष्टि के अनुसार हम यह भी कह सकते है कि हमाराजीवन का सब से महत्व पूर्ण उद्देश्य मृत्यु से पहले जितना संभव हो सके भलाईयां इकठ्ठा करना है|एक मुसलमान व्यक्ति अपनी जीवन का ध्यान रखता है, केवल जीने के लिए नहीं बल्कि इसलिए ताकि वह जितना संभव हो सके भलाईयां करे| अतः जब एक मुसलमान अनुभव करता है कि उसकी ज़िन्दगी में भलाईयां अधिक हो रही है तो वह अल्लाह से अपनी सुधीर्घ आयु करने और अमल (कर्म) मेंश्रेष्ठताउत्पन्न करने की दुआये करता है,जैसा कि अबू बक्र रजिअल्लाहुअन्हु की हदीस में है कि, एक व्यक्ति ने आप सेपूछा कि लोगो में सबसे श्रेष्ठ कौन है ? तो आप ने फ़रमाया : “जिसकी आयु सुदीर्घ हो और उसका अमल (कर्म) श्रेष्ठ हो|" फिर उसने पूछा लोगो में सबसे बुरा कौन है? आप ने फ़रमाया : “जिस की आयु (उम्र) सुदीर्घ(लम्बी) हो और उसका कर्म बुरा हो|” [सहीहअल जामे : 3297]

 

एक कष्ट

सबसे बड़ा दुःख जिसका अनुभव हर मुसलमान बल्कि हर इन्सान अधिक करता है कि उसका जीवन सीमित और निश्चित है, जिस में वह एक मिनट या एक सेकंड अधिक नहीं कर सकता और इन्सान की पूरी उम्र में से उसके आगे बढ़ने की प्रतिशत उम्र 20 वर्ष से अधिक नहीं है| क्यों कि मुहम्मद की जाती (उम्मत) की उम्र (आयु) 60 से 70 साल के बीच होती है| अतः उम्र का एक तिहाई भाग इन्सान सोने में बिताता है और 15 वर्ष की उम्र तक इन्सान शरीअत का दाई तथा पाबंद नहीं होता|अतः उसकी आयु का वह भाग जो वह खेल कूद और अन्य आनंद लेने में बिताता है| इसलिए उसके उम्र का एक तिहाई भाग ही लग भग बचता है| इसलिए आवश्यक है कि उन्नति काम की उम्र को बढाने के लिए उम्र को लम्बी करने वाले कारण तथा साधन अपनाये जाये|

 

आयु(उम्र) सुदीर्घ(लम्बी) करने का अर्थ

अनस बिन मालिक रजिअल्लाहुअन्हु से उल्लेखित है कि रसूल ने फ़रमाया : “जो व्यक्ति यह पसंद करे कि उसकी जीविका में बढ़ोतरी हो और उसकी मृत्यु पीछेकर दी जाये (अर्थात, उसकी आयु सुदीर्घ हो) तो वह दया (सिला रहमी) (रिश्ते नाते जोड़े)| [सहीह बुखारी 10/429, सहीह मुस्लिम 16/114]

आयु सुदीर्घ करने के अर्थ में उलमा (विद्वांसों) के विभिन्न  मत तथा सलाह है, उनमे तीन विषय निम्न लिखित है :

1-बरकत :अर्थात कम समय में जो कार्य आप कर ले वह कार्य आप के अतिरिक्य दूसरा व्यक्ति उतने कम अवधि में न कर सके|

2 –वास्तव में सुदीर्घ (लम्बी) होना|

3 –मृत्युके बाद अच्छी यादें|

आयु सुदीर्घ हो जाना ऊपर लिखी गयी तीनो अर्थ को शामिल हो सकता है| अल्लाह ताला अपने अनुग्रह तथा दया से जिसे चाहता है अनुग्रहित करता है| अल्लाह बहुत बड़ा दयावान है| इस से हमें यह पता चलता है कि, आयु सुदीर्घ (उम्र लम्बी) होने के लिए समय नष्ट किये बिना हमारा उद्देश्य अधिक से अधिक भलाईयां इकठ्ठा करना हो|

 

क्या आयु लम्बी होने की दुआ करना उचित है?

इसके बारे में उलमा (इस्लामी विद्वाम्स) के दो विचार है| कुछ इसे सही कहते और और कुछ इसे गलत कहते है| शेख मुहम्मद बिन उसैमिन रहिमहुल्लाहसे, अल्लाह तुम्हे देर तक बाकी रखे,तुम्हारी उम्र लम्बी हो, कहने के बारे में पूछा गया तो उन्होंने कहा : साधारणतय लम्बी उम्र की दुआ करना उचित नहीं है| क्यों कि लम्बी उम्र अच्छी भी होती है और बुरी भी| इसलिए कि लोगो में सबसे बुरे वह लोग है जिनकी उम्र लम्बी हो और उनके कार्य बुरे हो, अतः यदि ये कहा जाये कि, “अल्लाह ताला अपनी विधेयता तथा आज्ञापालन पर तुम्हे लम्बी उम्र दे” या इस जैसी कोई दुआ तो इसमें कोई बुराई नहीं|[अल मनाही अल्लफज़िय्यह – शेख मुहम्मद बिन सालेह अल उसैमिन - 2/225]

 

आधार

www.islamhouse.com

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