स्त्री की मुक्ति इस्लाम द्वारा

लोगों का विचार है कि, स्त्री की मुक्ति 20 वी शताब्दी (सदी) में हुई और पाश्चात्य देश की महिला बहुत खुले विचार की होती है| वास्तव में स्त्री की विमुक्ति न पुरुष ने की, न स्त्री ने की, बल्कि इसे अल्लाह ताला ने 7 वी शताब्दी में अपने अंतिम रसूल (ईशदूत) मुहम्मद के द्वारा किया, जो सारी मानवता के लिए भेजे गए| इस्लाम धर्म का मूल आधार खुरआन और हदीस है| यही हर स्त्री को अपने अधिकार और कर्तव्य बताते है|

विषय सूची

मानव अधिकार

1400 वर्ष पहले ही इस्लाम ने स्त्री को अल्लाह की उपासना और प्रशंसा के बारे में पुरुष के समान जवाबदेही का नियम लगू किया| नैतिकता में उन्नति के लिए कोई अवधि नहीं रखी| इस्लाम ने स्त्री को पुरुष के समान मानवता अधिकार दिए| खुरआन में कहा गया : “ऐ मनुष्यों ! अपने उस पालनहार से डरो, जिस ने तुम को एक जीव (आदम) से उत्पन्न किया, तथा उसी से उस की पत्नि (हव्वा) को उत्पन्न किया, और उन दोनों से बहुत से नर नारी फैला दिए| उस अल्लाह से डरो जिसके द्वारा तुम एक दूसरे से (अधिकार) मांगते हो, तथा रक्त संबंधों को तोड़ने से डरो, निःसंदेह अल्लाह तुम्हारा निरीक्षक है|” [खुरआन सूरा निसा 4:1]

स्त्री और पुरुष, दोनों एक ही तरीके से जन्म लेते है, इसलिए वह दोनों के मानव अधिकार समान है| स्त्री स्वभाव स्वरूप अमंगल (जैसा की कुछ धर्म समझते है) नहीं है, यदि ऐसा हो तो पुरुष भी अमंगल होना चाहिए| इसी तरह दोनों में कोई भी श्रेष्ठ नहीं, क्यों कि यह समानता के विरुध्ध है|

 

नागरिक अधिकार

इस्लाम धर्म ने स्त्री को अपनी बात रखने की और विचार प्रकट करने की पूरी स्वतंत्रता दी है| उसे अपना धर्म चुनने का पूरा अधिकार है| खुरआन में कहा गया : “धर्म में बल प्रयोग नहीं| सुपथ कुपथ से अलग हो चुका है....|” [खुरआन सूरा बखरह 2:256]     

इस्लाम स्त्री को अपने विचार प्रकट करने के लिए प्रोत्साहित करता है| अल्लाह के रसूल से प्रमाणित ऐसी कई घटनायें है जो साक्ष्य देती है कि, स्त्री आप से कई विषय – धार्मिक, आर्थिक, सामजिक – पर अपने विचार प्रकट करती थी| एक मुस्लिम स्त्री अपने पति को चुनने का अधिकार रखती है| मुस्लिम स्त्री की गवाही (साक्ष्य) कानूनी विषय में वैध है| वास्तविकता यह है कि, जिन विषयों में स्त्री अधिक जानकारी रखती है, उन विषयों में स्त्री की गवाही ही प्रधान होती है|

 

सामाजिक अधिकार

अल्लाह के रसूल ने कहा : “हर मुसलामन (स्त्री तथा पुरुष) के लिए ज्ञान प्राप्त करना अनिवार्य है|” [तिरमिज़ी 74 & इब्न माजह 224]

इस ज्ञान में खुरआन और हदीस का ज्ञान और दूसरा ज्ञान भी है| स्त्री और पुरुष दोनों को ज्ञान प्राप्त करने की क्षमता है| उन पर यह भी अनिवार्य है कि, भलाई को व्याप्त करे और बुराई की निंदा करे| स्त्री इस विषय में अधिक ज्ञान प्राप्त करना  इसलिए भी आवश्यक है, क्यों कि वह घर के भीतर के काम संभालती है, जैसे कि – पति को समर्थन देना, बच्चो को जन्म देना, उन्हें अच्छी शिक्षा देना – यह स्त्री का प्रथम कर्तव्य है| यदि कोई स्त्री इस्लामी कार्य करने घर से बहार जाये और वह कार्य मानवजाति को लाभदायक हो तो उस स्थिति में वह बाहर जा सकती है, परन्तु इस्लामी शरीअत (कानून) में रहते हुए|

माँ बनने के बारे में अल्लाह के रसूल ने कहा : “माँ के चरण के नीचे स्वर्ग है|” [इब्न माजह 2771]

इस से यह बात पता चलती है कि समाज में सुधार का मुख्य कारण माँ होती है| इन्सान के अन्दर सुरक्षा तथा प्रेम की भावना सबसे पहले माँ की शिक्षा द्वारा उत्पन्न होती है| इसलिए माँ का पढ़ा लिखा (ज्ञान, इल्म) होना आवश्यक है, ताकि संतान को सही शिक्षा प्राप्त हो|

 

आर्थिक अधिकार

खुरआन में कहा गया : “रात्री की शपथ जब छा जाये ! तथा दिन की शपथ जब उजाला हो जाये ! और उसकी शपथ जिस ने नर और मादा पैदा किये ! वास्तव में तुम्हारे प्रयास अलग अलग है|” [खुरआन सूरा लैल 92:1-4]

इन आयतों (वचनों) में कहा गया है कि नर और मादा (स्त्री और पुरुष) को अल्लाह ताला ने पैदा किया, अलग अलग प्रयास के लिए - विभिन्न कार्य, कर्तव्य, योग्यता के साथ| जिस तरह समाज में लोगो के विभिन्न काम है, उसी तरह परिवार में भी हर एक के विभिन्न कर्तव्य है| परिवार के हर सदस्य का कर्तव्य अलग है| इस्लाम धर्म के अनुसार साधारणतय स्त्री को घर के देख भाल की और पुरुष को बहार के काम (कमाना) की बाध्यता है| इसी लिए इस्लाम ने स्त्री को आर्थिक सहायता का अधिकार दिया| खुरआन में कहा गया : “पुरुष स्त्री के व्यवस्थापक है, इस कारण कि अल्लाह ने उनमे से एक को दूसरे पर प्रधानता दी है| तथा इस कारण कि उन्हों ने अपने धनो में से (उन पर) खर्च किया है|” [खुरआन सूरा निसा 4:34]

इस तरह पुरुष पर आर्थिक बाध्यता डाली गयी है और उन्हें चाहिए कि, स्त्री को आर्थिक सहायता के साथ शारीरिक सुरक्षा प्रदान करे तथा दया व आदर का व्यवहार करे|                     

मुस्लिम स्त्री को धन अर्जित करने की, संपत्ति रखने की, कानूनी अनुबंध करने की और अपनी संपत्ति को अपने इच्छा अनुसार खर्च करने की अनुमति है| वह अपने स्वयं का व्यापार कर सकती है और उसके धन पर किसी का अधिकार नहीं, यहाँ तक की पति का भी नहीं| खुरआन में कहा गया : “तथा उसकी कामना न करो, जिस के द्वारा अल्लाह ने तुम को एक दूसरे पर श्रेष्ठता दी है| पुरुषों के लिए उस का भाग है जो उन्होने कमाया| और स्त्रीओं के लिए उस का भाग है जो उन्होंने कमाया है| तथा अल्लाह से उसके अधिक की प्रार्थना करते रहो, अल्लाह सब कुछ जानता है|” [खुरआन सूरा निसा 4:32]

“और पुरुषों के लिए उस में से भाग है जो माता पिता तथा समीपवर्तियों ने छोड़ा है| तथा स्त्रीओं के लिए उस में से भाग है जो माता पिता तथा समीपवर्तियों ने छोड़ा हो, वह थोडा हो अथवा अधिक, सब के भाग निर्धारित है|” [खुरआन सूरा निसा 4:7]

 

पत्नि के अधिकार

खुरआन में कहा गया : “तथा उस की निशानियों (लक्षणों) में से यह (भी) है कि उत्पन्न किया तुम्हारे लिए तुम्ही में से जोड़े, ताकि तुम शांति प्राप्त करो उनके पास तथा उत्पन्न कर दिया तुम्हारे बीच प्रेम तथा दया, वास्तव में इस में कई निशानियाँ है उन लोगो के लिए जो सोच विचार करते है|” [खुरआन सूरा रूम 30:21]

विवाह कोई शारीरिक आवश्यकता की पूर्ती नहीं, बल्कि वास्तव में अल्लाह ताला की निशानी है| यह एक आपसी सम्बन्ध है, जिसमे एक दूसरे के अधिकारों का ध्यान रखा जाता है और यह सम्बन्ध अल्लाह के उपदेशों पर आधारित है| अल्लाह ताला ने स्त्री और पुरुष को दो विभिन्न स्वभावों पर पैदा किया और वह एक दूसरे की आवश्यकताओं को पूरा करते है| उनके स्वभाव स्वरूप के अनुसार उनके लिए खुरआन में अल्लाह ताला ने नियम निर्धारित किये है|

वस्त्र शरीर की रक्षा करते है और उसकी सुन्दरता अथवा दोष को ढांकते है| पति पत्नि भी एक दूसरे के लिए वस्त्र के समान है, जो एक दूसरे के अच्छाइयों को प्रकट करते है तथा दोष को छुपाते है| मुस्लिम पत्नियों को अनेक प्रकार के अधिकार उपलब्ध है| पहला अधिकार यह है कि, उन्हें महर (विवाह के समय पति द्वारा पत्नि को दिए जाने वाला उपहार, जो विवाह को वैध बनता है) प्राप्त होता है| दूसरा अधिकार उसका पालन पोषण| चाहे उसके पास धन कितना ही क्यों न हो, फिर भी पत्नि को खाना पीना, वस्त्र तथा घर उपलब्ध कराना पति का कर्तव्य है| किन्तु पति अपने सामर्थ्य से अधिक खर्च करने का पाबंद नहीं और न ही पत्नि को अनुचित मांग करनी चाहिए|

खुरआन में कहा गया : “चाहिए की संपन्न (सुखी) खर्च दे अपनी कमाई के अनुसार, और तंग हो जिस पर उस की जीविका तो चाहिए कि खर्च दे उस में से जो दिया है उसको अल्लाह ने| अल्लाह बार नहीं रखता किसी प्राणी पर परन्तु उतना ही जो उसे दिया है| शीघ्र ही कर देगा अल्लाह तंगी के पश्चात सुविधा|” [खुरआन सूरा तलाक 65:7]

अल्लाह ताला कहते है कि पुरुष स्त्री के संरक्षक है वह परिवार के नेता है| पुरुष का यह उत्तरदायित्व है कि वह अपने परिवार को अल्लाह की अनुज्ञा (आज्ञापालन) में लगा दे| स्त्री भी अपने घरेलु काम के अतिरिक्त सबके साथ करुणा का व्यवहार करे| अल्लाह के रसूल ने कहा : “तुम में सब से अच्छा विश्वासी वह है जिसका व्यवहार उत्तम हो और तुम में अच्छा वह है जो अपनी पत्नि के साथ अच्छा व्यवहार करे|”

अल्लाह ताला ने जोड़ो (स्त्री-पुरुष) को बनाया और उनमे आपस में प्रेम तथा दया रखा| स्त्री तथा पुरुष को एक दूसरे की आवश्यकता पड़ती है और उनकी लैंगिक इच्छा पूरी होती है| विवाह उनके इन इच्छाओं की पूर्ति करता है|

 

पत्नि के कर्तव्य

अधिकार के साथ कर्तव्य भी आते है| इसलिए पत्नि को पति के प्रति कुछ कर्तव्य है| खुरआन में कहा गया : “...अतः सदाचारी स्त्रियाँ वह है जो आज्ञाकारी तथा उनकी अनुपस्थिति में अल्लाह की रक्षा में उनके अधिकारों की रक्षा करती हो...|” [खुरआन सूरा निसा 4:34] पत्नि को अपने पति के रहस्य सार्वजानिक नहीं करना चाहिए और अपनी निजी ज़िन्दगी के बारे में किसी से कुछ नहीं कहना चाहिए| पति पत्नि का और पत्नि पति के गौरव का ध्यान रखना चाहिए| पत्नि अपने पति की संपत्ति की भी सुरक्षा करनी चाहिए| घरेलु खर्च बहुत देख समझ कर करना चाहिए, ताकि पति पर अधिक बार न पड़े| वह अपने घर में किसी ऐसे व्यक्ति को आने न दे, जिसे उसका पति न पसंद करता हो| मुसलिम पत्नि पति को हर विषय में साथ देना चाहिए| किन्तु जो व्यक्ति अल्लाह का अवज्ञाकरी हो, उसका साथ नहीं देना चाहिए| उसकी अवैध इच्छाओं को पूरा नहीं करना चाहिए| पति भी अपने पत्नि का गलत प्रयोग न करते हुए, उसकी ख़ुशी और अवसरों को ध्यान देना चाहिए|

 

निष्कर्ष

खुरआन में है : “तथा किसी विश्वासी पुरुष और किसी विश्वासी स्त्री के लिए योग्य नहीं है कि जब निर्णय कर दे अल्लाह तथा उस के रसूल किसी बात का तो उन के लिए अधिकार रह जाये अपने विषय में| और जो अवैज्ञा करेगा अल्लाह एवं उसके रसूल की तो वह खुले कुपथ में पड गया|” [खुरआन सूरा अहज़ाब 33:36]

मुस्लिम स्त्री को 1400 साल पहले ही ऐसे अधिकार तथा कर्तव्य दिए गए, जो आज की नारी को पश्चिम देशों में भी उपलब्ध नहीं है| यह सब नियम अल्लाह ताला ने बनाये है, जिस से समाज में संतुलन बना रहता है| एक स्थान पर कोई चीज़ की कमी दिखाई दे तो उसकी भरपाई दूसरे स्थान पर हो जाती है| इस्लाम सारे जीवन का मार्गदर्शन करता है, केवल मुसलमानों ही को नहीं, बल्कि सारी मानवजाति को|

 

आधार

http://www.beconvinced.com

See Also: Why_Are_Women_Turning_to_IslamWomen in Islam

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