मुहम्मद ﷺ की नबुव्वत और आपका संक्षिप्त जीवन चरित्र


अल्लाह के रसूल मुहम्मद अल्लाह द्वारा भेजे गए अंतिम रसूल व नबी है| आप के बाद प्रलय तक अब कोई नबी आने वाले नहीं है| आप पर भेजी गयी आसमानी किताब ‘खुरआन’ है और यही अंतिम दैव वाणी है|

 

विषय सूची

 

नुबुव्वत के संकेत

अल्लाह ने रसूल मुहम्मद के लिए बहुत सि निशानियाँ  बताई जो आप की नबुव्वत की भूमिका थी|

  1. इब्राहीम अलैहिस्सलाम की दुआ और ईसा अलैहिस्सलाम की शुभ सूचना|अल्लाह के रसूल मुहम्मद अपने बारे में स्वयं फरमाते है, “मै इब्राहीम की दुआ और ईसा की शुभ सूचना हूँ |”  (सिलसिला सहीहा: 1546)

    अल्लाह के रसूल मुहम्मद के कहने का तात्पर्य यह है कि मै इब्राहीम अलैहिस्सलाम  की दुआ का नतीजा इसलिए कि इब्राहीम अलैहिस्सलाम ने अपने बेटे इस्माईल अलैहिस्सलाम के साथ मक्का में काबा के निर्माण के समय कहा था|

    “ऐ हमारे पालनहार! तू हम से इस (नेक काम) को कबूल कर| तू ही सुनता और जानता है| ऐ हमारे मौला! हम को अपना आज्ञाकारी बंदा बना और हमारी औलाद में से भी एक ग्रोह को अपना आज्ञाकारी कीजिये और तू हम को हमारी उपासना के तरीके बता और तू हम पर रहम फरमा| तू ही है तौबा क़ुबूल करने वाला मेहरबान|” 

    “ऐ हमारे पालनहार! तू उन्ही में से एक रसूल पैदा कीजियो, जो उनको तेरी आयतें पढ़कर सुना दे और आसमानी किताब और सदाचार की बातें उनको सिखा दे और उनको पाक साफ कर दे| निससंदेह तू प्रभुत्वशाली और बड़ी हिकमत वाला है|” (सूरह बक़रह: 127 – 129)

    तो अल्लाह ने इब्राहीम और इस्माईल अलैहिमुस्सलाम की दुआ स्वीकार की| उनकी संतान में से अल्लाह के रसूल मुहम्मद को अंतिम नबी चुन लिया और ईसा अलैहिस्सलाम की शुभ सूचना का मतलब यह है कि अल्लाह के नबी ईसा अलैहिस्सलाम ने अल्लाह के रसूल मुहम्मद के नबी होने की शुभ सूचना दी थी जैसा कि अल्लाह फरमाता है :  “और जब ईसा बिन मरयम ने कहा था कि ऐ इस्राईल के बेटो! मै तुम्हारी ओर अल्लाह का रसूल होकर आया हूँ, मै अपने से पहली किताब तौरात की तस्दीक करता हूँ और एक रसूल की शुभ सूचना देता हूँ|” (सुरह सफ्फ: 6)

    ईसा अलैहिस्सलाम ने एक ऐसे नबी की शुभ सूचना दी जो उनके बाद आएगा और उसका नाम अहमद होगा और अहमद मुहम्मद के नामों में से एक नाम है|
     
  2. अल्लाह के रसूल मुहम्मद का अरब में पैदा होना – अरब ऐसी जाती थी जो उस समय की जातियों में सबसे श्रेष्ठ और उच्च मानी जाती थी यहाँ तक कि इस आध्यात्मिक सुधार और सम्मानित व सभ्य काम के लिए तैयार हो गयी जो दीन इस्लाम के रूप में वहाँ उतारा गया| यद्यपि यह जाती अज्ञानी, अनपढ़ और मूर्ती पूजा करने वाली और आपस में लडाई झगड़ों के कारण फूट का शिकार थी, इस सबके बावजूद अरब जाती अपनी राय और व्यक्तिगत आज़ादी के लिए प्रसिध्ध थी जबकि दूसरी जातियां धार्मिक व सांसारिक दासता का शिकार थी, उनपर इस बात की पाबन्दी थी कि वे ज्योतिषियों के बताये हुए धार्मिक आदेशों के अलावा किसी बात को समझे या किसी संसारिक या बौध्धिक समस्या में ज्योतिषियों का विरोध करे| जिस प्रकार की उन पर आर्थिक और नागरिक लेन देन की पाबंदियान थी और अरब जाती समस्त कार्यों के लिए इन सब पाबंदियों से आज़ाद थी जबकि दूसरी जातियां बादशाहों, सरदारों के अधीन थी| सबसे बड़ी विशेषता जिससे अरब प्रमुख थे वह यह थी कि वे लोगों में सबसे अधिक सुशील थे जबके दूसरी जातियां हर ओर और पैसों में उनसे अधिक प्रगतिशील थी| अल्लाह ने इस उम्मत को इस महान सुधार कार्य के लिए तैयार किया जो  मुहम्मद के ज़िम्मे आया|
     
  3. परिवार की शराफत (सज्जन लोग) : आप का परिवार शरीफ (सज्जन) परिवार था, अल्लाह ताला का इरशाद है :  “निस्संदेह अल्लाह ने आदम और नूह को, इब्राहीम और इमरान के परिवार को (जो मसीह के नाना थे) सर्वश्रेष्ट किया था|” (सुरह आले इमरान : 33 )

    अल्लाह ने उन लोगों को नुबुव्वत व मार्गदर्शन से सुशोभित किया और कुरैशी किनाना से और बनी हाशिम को कुरैश से चुना और बनू हाशिम से अल्लाह के रसूल मुहम्मद को चुना| इस प्रकार इस्माईल की संतान अगले और पिछले लोगों में सबसे श्रेष्ट थी जिस प्रकार इसहाक की संतान बीच के दौर के लोगों में बेहतर थी| अल्लाह ने कबीले कुरैश को इसलिए चुना क्योंकि उन्हें अल्लाह ने बड़े गुणों से सुशोभित किया था मुख्य रूप से मस्जिदे हराम की सेवा और मक्का में आबाद होने के बाद| इसलिए कि यह इस्माईल की संतान में गौत्र वंश में सबसे उच्च व श्रेष्ठ थे और सबसे अधिक बोलचाल में अच्छी शैली वाले थे| अल्लाह ने बनु हाशिम को इसलिए चुना कि वे चरित्र व आचरण वाले थे और लडाई व जंग के समय सबसे अधिक संधि करने को पसंद करने वाले थे| यतीम व फ़कीर के लिए सबसे अधिक दयालु थे, सार यह कि मुहम्मद का परिवार समस्त जातियों पर श्रेष्ठ चरित्र एवं आचरण की विशेश्ताओं में प्रमुख था फिर अल्लाह ने मुहम्मद को बनी हाशिम से चुना और उनको आदम की संतान में सबसे बेहतर सरदार बनाया|   
     
  4. अल्लाह के रसूल मुहम्मद का उच्च आचरण: अल्लाह ने आपको बड़ी अच्छी आदतों वाला बनाया| आप नबुव्वत से पहले अपनी जाती बल्कि समस्त मानव जाती में अच्छे आचरण और स्वभाव में खरे होने में सबसे बेहतर थे| अनाथ के रूप में पले बढे और पवित्र फ़कीर के रूप में जवान हुए फिर आपने विवाह किया और अपनी जीवन साथी के लिए आप प्रीय व निष्टावान थे| आप और आप के पिता ने कुरैश के धार्मिक व सांसारिक मामलों में से किसी की निगरानी नहीं की और न ही वे कुरैश के लोगों जैसी उपासना करते थे और न उनकी बैठकों में जाते थे| आप से कोई ऐसी बात व काम साबित नहीं जिससे पता चलता हो कि आप सरदारी के इच्छुक हो| आप सच्चाई, ईमानदारी और उच्च आचरण के लिए प्रसिध्ध थे, इसी कारण नुबुव्वत के पहले ही आपको श्रेष्ठ सम्मान मिल गया था और कुरैश आपको अमीन (ईमानदार व्यक्ति) के नाम से पुकारते थे| आप इन्ही गुणों के साथ जवान हुए और आपके पाक शरीर और पवित्र नफस में समस्त अंग बड़े ऊंचे दर्जे तक पहुँचे, आपने कभी किसी माल, पद और ख्याति की इच्छा नहीं की यहाँ तक कि आपके पास अल्लाह की ओर से वही का आना आरम्भ हुआ|
     
  5. आप उम्मी थे:अर्थात आप लिखना पढ़ना नहीं जानते थे, आप की नबुव्वत की सच्चाई का सबसे बड़ा तर्क यह था कि आप ने कभी कोई पुस्तक नहीं पढ़ी और न एक पंक्ति लिखी और न कोई शेअर कहा और न कोई वाक्य लिखा| आप महान दावत और न्याय प्रीय आसमानी शरीअत लेकर आए जिसने सामूहिक बिखराव व फूट को जड़ से उखाड दिया और अप ने मानने वालों को सदैव के लिए मानव सौभाग्य की ज़मानत दी और उन्हें उनके पालनहार के अलावा किसी अन्य की दासता से आज़ाद कराया| ये सारी चीज़ें नुबुव्वत के प्रमाण और उसकी सच्चाई के तर्क व दलीलें है|   

 

अल्लाह के रसूल मुहम्मद की वंशावली और उनके जीवन का संक्षिप्त परिचय

आप की वंशावली यह है : मुहम्मद  बिन अब्दुल्लाह बिन अब्दुल मुत्तलिब बिन हाशिम बिन अब्दे मुनाफ बिन कुसाई बिन किलाब बिन मुर्रह बिन काअब बिन लूई बिन ग़ालिब बिन फहर बिन मालिक बिन नज़र बिन किनानाह बिन खुजैमा बिन मुद्रिकाह बिन इलयास बिन मुज़र बिन निजार बिन मअद बिन अदनान|

 

अदनान परिवार अरब से था और अरब इसमाईल बिन इब्राहीम की संतान थी|  

 

आप की माँ आमना बिन्त वहब बिन अब्दे मुनाफ बिन ज़ोहर है और ज़ोहर आपके दादा के भाई का नाम है|

 

आप के वालिद अब्दुल्लाह ने आमना से शादी की और उनके साथ उनके घर ही तीन दिन ठहरे रहे और इसी बीच वे गर्भवती हो गयी|

 

आप का जन्म आमुल फील 571 ई. में हुआ| आप अपनी माँ के पेट ही में थे कि आपके वालिद का देहांत हो गया|

 

आप के दादा अब्दुल मुत्तलिब ने आप को पाला पोसा| तीन दिन तक आप की माँ ने आप को अपना दूध पिलाया फिर आपके दादा ने आप को दूध पिलाने के लिए हलीमा सादिया को दे दिया| हलीमा सादिया ने आप के कारण कई आश्चर्य जनक चीज़ें देखी|

 

अपने पति के साथ मक्का एक धीमी गति वाली कमज़ोर सवारी पर आई थी लेकिन जब मक्का से लेकर आप को वापस हुई तो आपकी सवारी बहुत तीव्र गति वाली हो गयी और सारी सवारियों को पीछे छोडती गयी| सारे सफ़र के साथी यह सब देखकर आश्चर्य कर रहे थे|

 

हलीमा का बयान है कि आपकी छातियों में दूध बहुत कम था जिसके कारण उनका अपना बच्चा भूक से रोता रहता था और जब अल्लाह के रसूल मुहम्मद   ने उनकी छाती मुह में डाली उस समय से दूध काफी बढ़ गया और अपने बच्चे व आप को दूध पिलाने लगी यहाँ तक कि दोनों पेट भर लेते|

 

हलीमा सादिया का यह भी बयान है कि उनका क्षेत्र निरंतर अकाल ग्रस्त रहता था और जब आप (मुहम्मद ) यहाँ पहुँचे तो वह क्षेत्र हरा भरा हो गया और सम्पन्नता आ गयी| दो वर्ष के बाद हलीमा आप को लेकर अपनी माँ व दादा के पास मक्का आई लेकिन हलीमा का आग्रह था कि आपको अभी उनके पास ही रहने दे ताकि बरकतों से लाभान्वित हो| आपकी माँ आमना ने दोबारा आपको हलीमा के हवाले कर दिया फिर दो वर्ष के बाद हलीमा आप की माँ के पास आप को लेकर आई और उस समय आपकी आयु चार साल थी| फिर आपकी माँ ने अपनी मौत तक आप को अपने पास रखा, आप की आयु उस समय छ साल थी फिर आप के दादा अब्दुलमुत्तलिब ने दो साल (मरने तक) आप का लालन पालन किया और अपनी मौत से पहले उन्होंने अपने लड़के और आप के चाचा अबू तालिब को आपके लालन पालन की वसीयत की, अतएव अबू तालिब ने अपने बच्चों और घर वालों की भांति आपका ध्यान रखा|

 

आप मक्का वालों की बकरियां चराते और उससे अपनी गुज़र करते| लग-भाग बारह साल की आयु में आपने अपने चाचा अबू तालिब के साथ व्यापार के उद्देश्य से शाम (लवैन्ट) का सफ़र किया, जहाँ बूहैरह राहिब से आपकी मुलाकात (मुठभेड़) हुई| उसने (आप पर अंतिम नबी की निशानी देखकर) आपके चाचा अबू तालिब को आपके बारे में शुभ सूचना दी और यहूदियों की दुश्मनी (शत्रुता) से उनको सचेत किया|

 

इसके बाद आपने दूसरी बार खदीजा बिन्त ख्वेल्द रजिअल्लाहुअन्हा की ओर से तिजारती सफ़र (यात्रा व्यापार) किया जिसमे बहुत अधिक लाभ हुआ और खदीजा ने बड़ा भारी पैसा मेहनत का दिया|

 

खदीजा रजिअल्लाहुअन्हा कुरैश की सुशील व सज्जन और प्रतिष्टित व धनि और बुध्धिमान महिला थी| उनको अज्ञानता काल में उनकी सज्जनता व शराफत के कारण ताहिरा कहा जाता था और जब उनके गुलाम मैसरा ने सफ़र के दौरान देखे हुए आपके उच्च आचरण वाले हालात (मामला) बताये और बुहैरह राहिब की शुभ सूचना उन तक पहुंची तो उन्होंने आप से शादी की इच्छा प्रकट की| खदीजा की शादी इस से पूर्व हो चुकी थी और उनके पति का देहांत हो चुका था| इस प्रकार आप की शादी खदीजा रजिअल्लाहुअन्हा से हुई| उस समय आप की आयु 25 साल और खदीजा रजिअल्लाहुअन्हा की आयु 40 साल थी| आपने उनकी मौत तक किसी से शादी नहीं की थी| नबुव्वत के दस साल बाद इनका देहांत हो गया| आप उन्हें  बराबर याद करते, इनकी ओर से सद्खा खैरात (चैरिटी और दान) करते और इनकी सखियों को उपहार और तोहफे देते रहते| आपकी यही वे पत्नी है जिनसे सिवाए इब्राहीम के आपकी समस्त संतान हुई| इब्राहीम आपकी दासी (गुलाम महिला) मारियह किब्तियाह  से पैदा हुए|

 

वही का आरम्भ

जब आपकी आयु 40 साल की हुई आपके शारीरिक, मानसिक अंगों की पूर्ती हो गयी तो सच्चे सपनों के रूप में आप पर वही (वहन) का अवतरित होना आरम्भ हो गया अतएव जो चीज़ आप सपने में देखते ठीक वैसे ही नज़र आती, फिर आप एकांत में रहने लगे और मक्का में हिरा नामक खोह के अन्दर एकांत वास धार लिया| आप कई रात अल्लाह की उपासना करते फिर खदीजा रजिअल्लाहुअन्हा के पास आते और खाना पीना लेकर वापस हो जाते यहाँ तक कि रमज़ान के मुबारक महीने में आप पर खुरआन का सिलसिला शुरू हुआ और अल्लाह के फ़रिश्ते जिब्रईल अलैहिस्सलाम ने आकर आपसे कहा : “पढ़िए|” आपने फ़रमाया : “मै पढ़ नहीं सकता|” फिर जिब्रईल ने कहा “पढ़िए”, आपने कहा : “मै पढ़ नहीं सकता|” जिब्रईल ने फिर कहा ,“पढ़िए” और आपने कहा, “मै पढ़ नहीं सकता|” और जिब्रईल हर तीनो जवाबों के बाद आपको सीने से लगाते और सख्ती से भींचते और तीसरी बार खुरआन मजीद की सबसे पहले उतरने वाली आयातों को पढ़ा : “ऐ रसूल! तू अपने रब का नाम पढा कर जिसने सब कुछ बनाया है, इंसान को अल्लाह ने जमे जुए खून से पैदा किया, अपने रब का नाम पढा कर, तेरा पालनहार बड़ी इज्ज़त वाला है| जिसने कलम के ज़रिये लिखना सिखाया, इंसान जो न जानता था उसको सिखाया|” [खुरआन सूरा अलक 96: 1-5]

 

ज्ञान का आदेश देने वाली और मनुष्य की पैदाईश का अभिव्यक्ति करने वाली इन महान आयातों से आप पर वहन (वही) का आना आरम्भ हुआ, आप अपनी पत्नी खदीजा रजिअल्लाहुअन्हा के यहाँ गए इस तरह कि आपका दिल धड़क रहा था, आप कांप रहे थे, आपने कहा : “मुझे कम्बल उढाओ.... मुझे कम्बल उढाओ|”   

 

आप को कम्बल से ढांप दिया गया और जब आपकी घबराहट दूर हो गयी तो आपने खदीजा रजिअल्लाहुअन्हा से पूरी घटना सुनाई और शंका प्रकट की कि मुझे अपनी जान का खतरा है| खदीजा रजिअल्लाहुअन्हा ने कहा : “कदापि नहीं... अल्लाह की कसम! आपको अल्लाह कभी भी रुसवा नहीं करेगा, आप रिश्तेदारों की मदद करते है, मोहताज की मदद करते है, फकीरों को सहारा देते है| कमज़ोर को शक्तिशाली बनाते है और सत्य को सहयोग देते है|”

 

फिर खदीजा रजिअल्लाहुअन्हा आपको लेकर अपने चचेरे भाई वर्का बिन नोफिल के पास गयी जो अज्ञानता में ईसाई हो गए थे और इबरानी भाषा में इंजील लिखते थे और बूढ़े व अंधे थे| इनसे खदीजा रजिअल्लाहुअन्हा ने कहा कि मुहम्मद जो कुछ कह रहे है इसे सुनिए| वर्का ने कहा, “ऐ भतीजे! तुम क्या देखते हो?” आप ने वर्का से सारी बातें बता दी| वर्का ने कहा कि यह वह फ़रिश्ता है जो मूसा अलैहिस्सलाम के पास आया करता था, काश मै इस समय जवान होता और उस समय जीवित होता जिस समय तुम्हारी जाती वाले तुम्हे निकालेंगे|

 

आपने वर्का से कहा, “क्या ये लोग मुझे निकाल देंगे?” वर्का ने कहा, “हाँ, कोई व्यक्ति तुम्हारी जैसी बात नहीं लाया मगर सारे लोग उसके दुश्मन हो गए और यदि मै उस समय जीवित रहा तो तुम्हारी ठोस मदद करूंगा|”  

 

फिर वर्का का देहांत हो गया और वहन (वही) का क्रम रुक गया| कुछ दिनों तक वहन (वही) का क्रम टूटा रहा जिसमे आपकी योग्यता व क्षमता शक्तिशाली और पक्की हो गयी और आपका शौक़ और इच्छा बढ़ गयी, आपने फ़रमाया : “मै चल रहा था कि मैंने आसमान से एक आवाज़ सुनी, अपनी निगाह मैंने उठाई तो वह फ़रिश्ता (देवदूत ) नज़र आया जो हिरा की खोह में मेरे पास आया था|” आप का बयान है कि आपने उस से ऐसा भय प्रतीत किया जो पहले भय से कम था| आप अपने घर आये और कपडा ओढ़ लिया| फिर अल्लाह ने अपनी यह आयत उतारी: “ऐ (नबुव्वत का) वस्त्र ओढने वाले, उठ! और अज़ाब से डरा और अपने रब की बड़ाई बयान कर और अपने कपडे और दिल को पाक साफ रख अर्थात शिर्क आदि की नजासत से दूर रख|” [खुरआन सूरा मुद्दस्सिर dassir74 : 1-7]

 

अर्थात ऐ कपडा ओढने वाले खड़े हो, लोगों को खुरआन से जगाओ, अल्लाह का सन्देश उन तक पहुँचाओ, अपने कपडे और अपने कर्मों को बहुदेववाद की गंदगियों से पाक रखो| बुतों को छोड़ दो, बुत की पूजा करने वालों से दूर रहो|

 

फिर इसके बाद वहन (वही) का क्रम बराबर चलता रहा और आप अपने पालनहार के आदेशानुसार उसकी दावत का प्रचार करते रहे| आपकी ओर वही की गयी कि आप लोगों को केवल अल्लाह की उपासना और उसके दीन (इस्लाम) की ओर दावत दे, जिसको अल्लाह ने पसंद किया और अंतिम दीन ठहराया|

 

आप तत्व दर्शिता व सूझबूझ, अच्छी नसीहत और उत्तम तर्क वितर्क द्वारा अपने पालनहार की ओर बुलाते रहे| अतएव आपकी दावत पर सबसे पहले औरतों में खदीजारजिअल्लाहुअन्हा, मर्दों में अबू बकर सिद्दीख और बच्चों में अली ने इस्लाम स्वीकार किया| फिर अल्लाह के दीन में लोग दाखिल होते रहे| यह देखकर मक्का के बहुदेव वादी बड़े परेशान हुए और उन्होंने आपको मक्का से निकाल दिया और आपके साथियों को कठोर यातनाएं दी| अतः आपने मदीने की ओर हिजरत (देश परित्याग) की और आप पर वही बराबर उतरती रही और आप अपनी दावत, जिहाद और विजयों में लगे रहे यहाँ तक कि सफल और विजेता के रूप में मक्का वापस आये|

 

इसके बाद अल्लाह ने दीन को पूर्ण कर दिया और इस्लाम के सम्मान और मुसलमानों के विजयी होने से आपकी आँखों को ठंडक पहुंची| फिर 63 साल की आयु में आपकी वफात हो गयी| इसमें नबुव्वत से पहले चालीस साल और 23 साल नबी के रूप में| अल्लाह ने आसमानी संदेशों का सिलसिला समाप्त किया और जिन्नों व मनुष्यों पर आपका आज्ञा का पालन अनिवार्य ठहरा दिया| अतः जिसने आपकी आज्ञा का पालन किया वह दुनिया में सौभाग्य वाला रहा और आखिरत में जन्नत का हकदार हुआ और जिसने आपकी अवज्ञा की वह दुनिया में अपमानित होगा और आखिरत में जहन्नम में दाखिल होगा|

 

आपकी वफात के बाद आपके साथी आपके तरीके पर चलते रहे और आपकी दावत का प्रचार करते रहे और उन्होंने इस्लाम के द्वारा देशों को विजय किया और सत्य धर्म का अच्छी तरह प्रचार व प्रसार किया|

 

आपका चरित्र एवं आचरण

आप मनुष्यों में सबसे अधिक सदाचारी थे| नुबुव्वत से पहले अज्ञानता काल में भी आप इसमें प्रमुख थे और अल्लाह ताला ने आपको अपने इस कथन से संबोध किया : “निश्चय ही आप उच्च आचरण वाले है|”

 

अल्लाह ने आपको उत्तम अदब सिखाया और आपका अच्छा प्रशिक्षण किया| खुरआन आपका आचरण था और आप उससे अदब सीखते और लोगों को इसके द्वारा अदब सिखाते| अतएवं आपके चरित्र एवं आचरण में से ये चीज़ें थी कि आप सबसे अधिक नम्र स्वभाव, शांत भाव, न्याय प्रीय और दानवीर थे, आप अपना जूता स्वयं सीते, कपडे में पेबंद लगाते और घर में अपने बच्चों की मदद करते और उनके साथ गोश्त काटते| आप सबसे अधिक शर्मीले थे| आप हर एक की दावत क़ुबूल करते और थोडा हदिया भी लेते और बदले में हदिया भी देते|

 

आप अल्लाह के लिए नाराज़ होते अपने लिए नहीं| आप कभी कभी भूके होते तो भूक की सख्ती के कारण अपने पेट पर पत्थर बांधते और जो कुछ पा लेते खा लेते| किसी खाने में कमी न निकालते, खजूर, भुना गोश्त, गेहूं या जौ की रोटी, मिठाई या शहद दूध जो भी चीज़ पाते खा लेते, आप बीमारों का हाल पूछने जाते, जनाजों में जाते और दुश्मनों के बीच बिना किसी अंग रक्षक के अकेले चलते| आप सबसे अधिक आवभगत करने वाले थे| आपके बात करने का बड़ा प्रभावी अंदाज़ था| दुनिया की किसी भी चीज़ से आप परेशान नहीं होते| आपको जो भी जायज़ कपडा मिलता उसे पहन लेते| जो भी सवारी घोडा, ऊँट, खच्चर आदि मिलती उस पर सवार हो जाते या पैदल चलते|

 

आप पीड़ितों कमजोरों के साथ बैठते| गरीबों को खाना खिलाते और चरित्र वान लोगों का सम्मान करते| रिश्तेदारों का हक़ देते, उनके साथ मिलकर रहते| किसी पर ज़ुल्म व अत्याचार नहीं करते| शिकायत करने वाले की शिकायत सुनते, ठीक होती तो उसे दूर करते| आपका अधिकांश समय अल्लाह के मार्ग में गुज़रता| आप किसी ग़रीब को तुच्छ नज़र से नहीं देखते और न किसी बादशाह की बादशाहत को महत्त्व देते| आप निर्धन व बादशाह सब को समान रूप से अल्लाह की ओर बुलाते|

 

अल्लाह ने आपको बेहतरीन आचरण और पुख्ता राजनीती से सुशोभित किया था यद्यपि आप उम्मी थे (अर्थात नबी देख कर पढ़ना लिखना नहीं जानते थे), आप का लालन पालन गरीबी व मोहताजी वाले रेगिस्तानी क्षेत्र में यतीम के रूप में बकरियों के देख रेख करते हुआ| अल्लाह ने आप को सारे बेहतरीन आचरण, अच्छे तरीके, पहले और बाद में आने वाले लोगों की ख़बरें और दुनिया और आखिरत में सफल बनाने वाली चीज़ों की शिक्षा दी| आप हर व्यक्ति की ज़रुरत की पूर्ती के लिए खड़े हो जाते| आप बुरे स्वभाव और बाजारों में चिल्लाने वाले नहीं थे, आप बुराई का बदला बुराई से नहीं देते थे बल्कि क्षमा करते| आप हर मिलने वाले से सलाम में पहल करते और हर आने वाले का सम्मान करते| आप क्रोध से बहुत दूर रहते और बहुत जल्द राज़ी हो जाते और लोगों के साथ सबसे अधिक स्नेह का बर्ताव करते और लोगों को सबसे अधिक लाभ पहुंचाते| आप सरलता को पसंद फरमाते| सख्ती को नापसंद करते| जो व्यक्ति आपको अचानक देखता आपसे प्रभावित हो जाता और जो जानकर आपसे मिलता आपसे मोहब्बत करता|

 

आप की नुबुव्वत की सत्यता पर अंग्रेज़ दार्शनिक थामस कार-लायल की गवाही      

कोई न्याय प्रीय बुध्धिमान मनुष्य आपकी नुबुव्वत की पुष्टि किये और मान्यता दिए बिना नहीं रह सकता| इसलिए की आपके सच्चे ईशदूत होने की बहुत अधिक गवाहियाँ और दलीलें है और निश्चय ही विरोधी की गवाही का अपना महत्त्व होता है और अच्छाई वह है जिसकी गवाही दुश्मन भी दे|

 

यहाँ नोबेल पुरस्कार प्राप्त प्रसिध्ध अंग्रेज़ दार्शनिक थामस कार-लायल की गवाही प्रस्तुत की जा रही है| उसने अपनी पुस्तक (बहादुर) में अल्लाह के रसूल मुहम्मद के बारे में अपनी जाती ईसाईयों को संबोध करते हुए लम्बी वार्ता लिखी है जिसका एक हिस्सा यह है :

 “इस दौर में किसी भी व्यक्ति के लिय बहुत बड़ी लज्जा की बात है कि वह यह माने कि इस्लाम का दीन झूठा है और मुहम्मद झूठे है, धोके बाज़ है और हमारे लिए आवश्यक है कि हम इस तरह की शर्मनाक तुच्छ प्रोपगंडे की जाने वाली बातों का बचाव करे|इसलिए कि वह सन्देश जिसे रसूल लेकर आया बारह सदियों तक लगभग दो सौ मिलियन लोगों के लिए रोशन चिराग रहा है| क्या तुम में से कोई इस सन्देश को झूठा और धोके बाज़ समझ सकता है जिस पर लोगों की एक बड़ी संख्या जीवित रही और उसी पर मरी| मै तो इस प्रकार का विचार कदापि नहीं रखता और यदि झूट और धोका लोगों में इस प्रकार प्रचलित और लोकप्रीय हो जाये तो लोगों को मूर्ख और पागल ही कहा जायेगा| बड़े दुःख की बात है कि यह विचार इतना बुरा और ये लोग कितने कमज़ोर और दया योग्य है|

 

अतः जो व्यक्ति सांसारिक ज्ञान में किसी दर्जे व स्थान पर पहुंचना चाहता है उसके लिए आवश्यक है कि इन मूर्खों की किसी बात को सत्य न माने इसलिए कि ये बातें कुफ्र और अधर्म का नतीजा है और ये दिलों की गन्दगी, अंतरात्मा के बिगाड़, शरीर में आत्मा की कमी की दलील है शायद दुनिया में इस से अधिक और कुफ्र पर आधारित राइ कभी न देखि हो| और लोगों! क्या तुमने कभी किसी झूठे आदमी को दीन आविष्कार करते हुए और उसे खुल्लम खुल्ला फैलाते हुए देखा है|

 

अल्लाह की कसम झूठा आदमी ईट से घर नहीं बना सकता क्योंकि जब वह मिटटी और निर्माण में काम आने वाली दूसरी वस्तुओं की विशेषताओं से परिचित नहीं होगा तो घर का निर्माण किस प्रकार कर सकता है और इमारत इस योग्य नहीं होगी कि अपनी बुनियाद पर बारह सदियों तक स्थापित रह सके जिसमे 20 करोड़ लोग रह रहे हो|

 

अलबत्ता वह इमारत इस योग्य होगी कि उसके स्तंभ गिर जाये और वह ढह जाये| “थामस कारलायल” ने यहाँ तक कहा कि इस आधार पर हम मुहम्मद को कभी भी झूठा नहीं ठहरा सकते जो अपने उद्देश्य की पूर्ती के लिए हीले व बहाने की मदद लेता हो, बादशाहत के दर्जे तक पहुँचने की इच्छा रखता है| उसने जो सन्देश पहुँचाया वह सच्चा है और स्पष्ट है और उसकी बात सच्ची बात है| हमने उनको जीवन भर शक्तिशाली अकीदा, पक्का विश्वास व दृढ़ संकल्प वाला, सज्जन व कृपाल, परिश्रमी और निष्ठावान पाया| पक्षपात ईसाई और नास्तिकों का कहना है कि मुहम्मद का उद्देश्य केवल व्यक्तिगत प्रसिध्धि और मान सम्मान की प्राप्ति था|

 

कदापि नहीं, उस व्यक्ति के दिल में ये सारी चीज़ें न थी बल्कि उसका दिल स्नेह, दयालुता, भलाई और तत्वदर्शित व सूझ बूझ जैसे गुणों से भरा होता था जो सांसारिक लालच व मान सम्मान के विरुध्ध है|   

 

“अतः हमें जालिमों के धर्म कि मुहम्मद झूठे है से विमुखता बरतनी और उनकी अनुकूलता को समर्थन व मूर्खता मानना चाहिए|” निश्चय ही वह दीन जिस पर मूर्ती पूजा करने वाले अरब ईमान लाये और उस पर दृढ़ता के साथ जमे रहे इस योग्य है कि वह सत्य और खरा हो और उसको मान्यता दी जाये| इसका प्रकाश चारों ओर फ़ैल गया और उसकी किरणों ने उत्तर को दक्षिण से और पूर्व को पश्चिम से जोड़ दिया और इस घटना के पश्चात एक सदी भी नहीं गुजरी, यहाँ तक कि अरब राज्य का एक प्रतिनिधि भारत में और एक अन्द्लुस में तैयार हो गया और इस्लाम की पूँजी ने उच्चता व सज्जनता के प्रकाश से एक दीर्घ काल को रोशन कर दिया|

 

इस्लाम की कुछ विशेषताएं

इस्लाम प्राकृतिक दीन और शांति व सुरक्षा का धर्म है| मानवता को सुख शांति, समृध्धि केवल इस्लाम को अपनाने और इसकी शिक्षाओं को जीवन के समस्त स्थलों में लागू करके ही प्राप्त हो सकती है| इस्लाम की महानता उन प्रमुख विशेषताओं से प्रामाणित होती है जो इस्लाम के अलावा दूसरे धर्मों में नहीं पाई जाती| कुछ विशेषताएं जो इस्लाम की पहचान और कुछ अन्य विशेषताएं जो लोगों की अत्यन्त आवश्यकता व उसकी चाहत को प्रामाणित करती है वे निम्न है :  इस्लाम अल्लाह का भेजा हुआ दीन है| अल्लाह उन चीज़ों को अधिक जानता है जो मनुष्यों के लिए उचित व ठीक है : “सुनो! जो पैदा करने वाला है वो सब कुछ जानता है और वो बहुत बारीक देखने वाला वह खबर रखने वाला है|”

आधार

पुस्तक: इस्लाम का रास्ता

लेखक: मुहम्मद बिन इब्राहीम अलहम्द

अनुवाद: अब्दुल करीम सलफी

वेबसाइट: इस्लाम हाउस

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