बच्चे


बच्चे बहुत अहम् (विशेष) होते है| उनकी अलग पहचान होती है| अल्लाह के नबी ﷺ ने अपने व्यवहार से इसे प्रमाणित कर दिया| आप बच्चो से दया और कृपा का व्यवहार करते थे| आप बच्चों को प्रोत्साहित करते थे, उन्हें गले लगाते थे, उनकी पीट थपकते थे, उनके सर के बाल अपने हाथ से सवारते थे| आप बच्चों से खेलकर बहुत प्रसन्न होते थे|

विषय सूची

हर बच्चा जन्मतः मुस्लिम होता है

अबू हुरैरह रजिअल्लाहुअन्हु ने उल्लेख किया कि, अल्लाह के रसूल मुहम्मद ने फ़रमाया : “हर शिशु अपने सच्चे धर्म पर जन्म लेता है (अर्थात अल्लाह के सिवा किसी की उपासना न की जाये), परन्तु उसके माता पिता उसे यहूदी या ईसाई या अग्नि की पूजा करने वाला बनाते है| एक जानवर जैसे अपने बच्चे को सम्पूर्ण तरीके से जन्म देता है| क्या जानवर के बच्चे में कुछ परिवर्तन पाया जाता है ?” उसके बाद अबू हुरैरह रजिअल्लाहुअन्हु ने खुरआन की यह आयत (वचन) पढ़ी : “तो (ऐ नबी!) आप सीधा रखे अपने मुख इस धर्म की दिशा में एक ओर हो कर उस स्वभाव पर पैदा किया है अल्लाह ने मनुष्यों को जिस पर| बदलना नहीं है अल्लाह के धर्म को, यही स्वाभाविक धर्म है किन्तु अधिकतर लोग नहीं जानते|” [खुरआन सूरा रूम 30:30] [तफसीर अत तबरी, vol 21, पृष्ठ 41] [सहीह बुखारी 1358 (vol 2:440)]

 

बच्चों के अधिकार

अब्दुल्लाह इब्न उमर रजिअल्लाहुअन्हु के उल्लेख के प्रकार अल्लाह के रसूल ने कहा, “.......तुम्हारे बच्चों के अधिकार तुम पर है|” [सहीह मुस्लिम 1159]

 

जन्म के समय शिशु के अधिकार

1 तहनीक : शिशु जब जन्म लेता है, तहनीक सुन्नत है (खजूर शिशु के मुँह में डालना)| [सहीह बुखारी 5153 ; सहीह मुस्लिम 2144]           

2 नामकरण : शिशु को अच्छा नाम देना चाहिए, जैसा – अब्दुल्लाह, अब्दुल रहमान| [सहीह मुस्लिम 2132, 2315]

3 सर के बाल कटाना (मुंडवाना) : जन्म के 7 वे दिन शिशु के सर के बाल मुंडवाना चाहिए और उसके तोल (वज़न) के बराबर (समान) चाँदी दान करना चाहिए| [तिरमिज़ी 1519, शेख अल्बानी रहिमहुल्लाह ने इसे हसन कहा – सहीह तिरमिज़ी 1226]

4 अकीका : हर शिशु पर जन्म के 7 वे दिन पशु बलि का संकल्प, प्रतिज्ञा है| उसका सर मुंडा जाये और उसे नामकरण किया जाये|” [अबू दावूद 2838, शेख अल्बानी रहिमहुल्लाह ने इसे सहीह कहा – सहीह अल जामि 4541]

लड़के के लिए दो बकरे और लड़की के लिए एक| [तिरमिज़ी 1513, सहीह तिरमिज़ी 1221, अबू दावूद 2834, नसाई 4212, इब्न माजह 3163]

5 खतना (परिशुध्ध करना) : “फितरह (प्राकृतिक स्वभाव) में पाँच चीज़ है या फितरह में पाँच चीज़ आते है : खतना (परिशुध्ध करना), गुप्तांग के बाल निकालना, बगल के बाल निकालना, नाखून निकालना, मूछ छोटे करना|” [सहीह बुखारी 5550, सहीह मुस्लिम 257]

 

बच्चों के लिए अल्लाह की शरण की प्रार्थना करना

अल्लाह के रसूल हसन और हुसैन के लिए अल्लाह के शरण की प्रार्थना इस तरह से करते थे : (बुरी नज़र से बचने की दुआ) “उईजुकुमा बिकलिमातिल्लाहित्ताम्मति मिन कुल्लि शैतानिन व हाम्मातिन व मिन कुल्लि ऐनिन लाम्मातिन”

अर्थ : “मैं तुम्हारे लिए अल्लाह के परिपूर्ण शब्द से शरण चाहता हूँ, हर शैतान और हर जानवर और हर बुरी नज़र से|” [सहीह बुखारी vol 4:119]

 

बच्चों की शिक्षा और परवरिश के अधिकार

अब्दुल्लाह रजिअल्लाहुअन्हु ने उल्लेख किया कि, अल्लाह के रसूल ने कहा : “तुम में हर कोई चरवाह है और अपने झुण्ड, समूह का उत्तरदायी है| जो लोगो का नायक है, वह उन लोगो का चरवाह है| एक पुरुष उसके घर (परिवार) का चरवाह और उत्तरदायी है| एक स्त्री उसके पति के घर की और उसके बच्चों की चरवाह और उत्तरदायी है| एक सेवक उसके मालिक के धन का चरवाह और उत्तरदायी है| तुम में हर कोई चरवाह है और अपने झुण्ड, समूह का उत्तरदायी है| [सहीह बुखारी 2416, सहीह मुस्लिम 1829]

इसलिए माता पिता उनके संतान की शिक्षा (इस्लामी और प्रापंचिक) के उत्तरदायी है और उन्हें अच्छा जीवन प्रदान करना चाहिए|

 

बच्चों को पहले किस चीज़ की शिक्षा देनी चाहिए?

बच्चों को पहले अत्यंत मुख्य चीज़ की शिक्षा देनी चाहिए, उसके पश्चात दूसरे मुख्य चीज़ की| इसलिए पहले सही आस्था (सच्चा अकीदा) का ज्ञान देना चाहिए, जो शिर्क (अनेकेश्वरवाद) और बिदाह (नवरीति) से पवित्र हो| उसके पश्चात उपासना की पध्धति बताई जाये, विशेष रूप से नामाज़ की| उसके बाद हर अच्छे, उत्तम व्यवहार की शिक्षा दी जानी चाहिए|

“तथा (याद करो) जब लुकमान ने कहा अपने पुत्र से जब वह समझा रहा था उसे : ऐ मेरे पुत्र ! साझी मत बना अल्लाह का, वास्तव में शिर्क (मिश्रणवाद) बड़ा घोर अत्याचार है|” [खुरआन सूरा लुकमान 31:13]

 

अनुशासन

अब्दुल मलिक इब्न अल रबी इब्न सब्रह ने अपने पिता से उल्लेख किया की, उनके दादा ने कहा : अल्लाह के रसूल ने कहा : “जब बच्चा सात वर्ष का हो जाये तो उसे नमाज़ पढ़ना सिखाओ और जब दस वर्ष का हो जाये तो नमाज़ न पढने पर हल्का मरो|” [तिरमिज़ी 407, अबू दावूद 494, शेख अल्बानी रहिमहुल्लाह ने सहीह अल जामि 4025 में इसे सहीह कहा]

 

उच्च व्यवहार की शिक्षा

हर माता पिता अपने संतान को उच्च व्यवहार की शिक्षा दे| अल्लाह के प्रति, अल्लाह के रसूल के प्रति, खुरआन के प्रति, उम्मत (मुस्लिम समुदाय) के प्रति और हर एक मानव के प्रति, जिसे वह जानता हो और जिस पर उसके अधिकार हो| जिनके साथ उनका मिलना झुलना हो और अपने पड़ोसियों के साथ तथा मित्रों के साथ दुर्व्यवहार न करे|   

अल नववी रहिमहुल्लाह ने कहा :

पिता अपने संतान को धार्मिक कर्तव्य के बारे में बताएं| संतान युवावस्था को पहुँचने से पहले पिता या बच्चों का उत्तरदायी (ज़िम्मेदार), उन्हें यह सीख देना अनिवार्य है| शाफ़ई और उनके साथी का यही कहना है| उन्होंने कहा : यदि पिता न हो तो यह शिक्षा देना माता पर भी अनिवार्य है| [शरह अल नववी अला सहीह मुस्लिम 8/44]

अपनी संतान अग्नि के निकट जाने से बचाना हर पिता का धर्म है| “ऐ लोगो जो ईमान लाये हो ! बचाओ अपने आप को तथा अपने परिजनों को उस अग्नि से जिस का ईंधन मनुष्य तथा पत्थर होंगे| जिस पर फ़रिश्ते नियुक्त है कड़े दिल, कड़े स्वभाव वाले| वह अवैज्ञा नहीं करते अल्लाह के आदेश की तथा वही करते है जिस का आदेश उन्हें दिया जाये|” [खुरआन सूरा तहरीम 66:6]

 

उन पर दया, कृपा करना

आप बच्चों से बहुत प्रेम करते थे और उन्हें प्यार किया करते थे| अबू हुरैरह रजिअल्लाहुअन्हु ने उल्लेख किया कि, अल्लाह के रसूल ने हसन बिन अली को प्यार किया| उस समय अखरा बिन हाबिस अत तमीम वहाँ बैठे हुए थे| उन्होंने पूछा : “मुझे दस बच्चे है| मैंने उन्हें कभी प्यार नहीं किया|” अल्लाह के रसूल ने उनकी ओर एक नज़र डाला और कहा : “जो दूसरों के साथ दया नहीं करता, उस पर दया नहीं की जाएगी|” [सहीह बुखारी 5997, vol 8:26]

 

रात के समय

जाबिर बिन अब्दुल्लाह ने उल्लेख किया कि, अल्लाह के रसूल ने कहा : “जब रात होती है (या शाम) तो अपने बच्चों को अपने पास रखो| क्यों कि उस समय शयातीन फैले हुए होते है| परन्तु जब रात का समय समाप्त हो जाये तो बच्चों को छोड़ सकते है| दरवाजे बंद रखिये और अल्लाह का नाम लीजिये, शैतान बंद दरवाज़ा नहीं खोलता|” [सहीह बुखारी 4:523]

 

बच्चे परीक्षा है

अल्लाह ताला ने कहा : “तुम्हरे धन तथा तुम्हारी संतान तो तुम्हारे लिए एक परीक्षा है| तथा अल्लाह के पास बड़ा प्रतिफल (बदला) है|” [खुरआन सूरा तगाबुन 64:15]

हुजैफा रजिअल्लाहुअन्हु ने कहा : “इन्सान अपने परिवार में, संपत्ति में, संतान में, पड़ोसियों में खोया रहने का प्रायश्चित अपनी नमाज़, ज़कात (विधि दान), भलाई का आदेश देना तथा बुराई से रोकने के द्वारा करता है|” [सहीह बुखारी 7096] [2]

 

खर्च करना

पिता के लिए अपने संतान के प्रति यह एक अनिवार्य कर्तव्य है| पिता इस विषय में लापरवाही न बरते|

अब्दुल्लाह इब्न अम्र रजिअल्लाहुअन्हु ने उल्लेख किया : अल्लाह के रसूल ने कहा : “जिस व्यक्ति पर खर्च करने का कर्तव्य है, वह यदि उस कर्तव्य को पूरा न करे तो वह पापी होगा|” [अबू दावूद 1692, शेख अल्बानी ने इसे (सहीह अल जामी 4481) में हसन कहा]

आइशा रजिअल्लाहुअन्हा ने उल्लेख किया कि : “एक स्त्री मेरे पास अपने दो लड़कियों को लेकर आई और मुझसे खाने के लिए कुछ माँगा| मेरे पास एक खजूर के सिवा कुछ नहीं था| मैंने वह खजूर उसे दे दिया| उसने उस खजूर को अपने दो लड़कियों में समान बाँट दिया और वहाँ से चली गई| जब अल्लाह के रसूल भीतर आये तो मैंने आप को इस बारे में बताया|” आप ने कहा : “जो भी इन लड़कियों का संरक्षक है, यदि वह इन्हें अच्छा पोषण दे, तो वह उसके लिए नरक की अग्नि से बचने का साधन होगा|” [सहीह बुखारी 5649, सहीह मुस्लिम 2629]

 

न्याय के साथ व्यवहार करना

बच्चों के साथ न्याय का व्यवहार करना चाहिए| इस विषय में अल्लाह के रसूल ने कहा : “अल्लाह से डरो और अपने संतान के साथ न्याय करो|” [सहीह बुखारी 2447, सहीह मुस्लिम 1623]

न लड़की को लड़के पर प्राधान्यता देनी चाहिए और न लड़के को लड़की पर प्राधान्यता देनी चाहिए| यदि कोई पिता ऐसा करता है तो, इस से कई बुराइयाँ जन्म लेती है, जैसा कि : इस तरह का व्यवहार करने से बच्चों को अपने पिता पर द्वेश पैदा होता है| अल्लाह के रसूल ने नूमान के पिता से कहा : “क्या तुम चाहते हो कि, वह तुम्हे समान रूप से गौरव दे?” उन्होंने कहा : “हाँ|” यदि तुम उनसे समान गौरव चाहते हो तो उन्हें भी समानता की निगाह से देखो और उन्हें उपहार देने में भी समानता दिखाया करो| [3]

 

अपना प्रेम अभिव्यक्त करना

अल्लाह के रसूल ने कभी बच्चों से प्रेम छुपाया नहीं, बल्कि उसे अभिव्यक्त किया| आप बच्चों को गोद में उठाया करते थे, उनसे खेलते थे और उन्हें प्यार किया करते थे| आप उन पर श्रध्दा दिखाया करते थे|

अबू हुरैरह रजिअल्लाहुअन्हु ने उल्लेख किया कि, अल्लाह के रसूल ने हसन बिन अली को प्यार किया| उस समय अखरा बिन हाबिस अत तमीम वहाँ बैठे हुए थे| उन्होंने पूछा : “मुझे दस बच्चे है| मैंने उन्हें कभी प्यार नहीं किया|” अल्लाह के रसूल ने उनकी ओर एक नज़र डाला और कहा : “जो दूसरों के साथ दया नहीं करता, उस पर दया नहीं की जाएगी|” [सहीह बुखारी 5997]

एक हदीस में अबू हुरैरह रजिअल्लाहुअन्हु ने उल्लेख किया : मैं अल्लाह के रसूल के साथ दिन के समय गया| परन्तु आप ने  मुझसे बात नहीं किया और मैं ने भी आप से बात नहीं की, यहाँ तक की हम बनू खैनुखा पहुँच गए| आप फातिमा रजिअल्लाहुअन्हा के खेमे में वापस आये और कहा, “क्या छोटा बच्चा (अर्थात हसन) यहाँ है?” हमने सोचा कि बच्चे की माँ ने उन्हें स्नान कराने और वस्त्र बदलने के लिए, बच्चे को अन्दर रखा है| कुछ ही समय बाद वह (हसन) बाहर आये और दोनों (अल्लाह के रसूल और हसन रजिअल्लाहुअन्हु) आपस में आलिंगन (गले मिले) किये| उसके पश्चात आप ने कहा : “ऐ अल्लाह ! मैं इस से प्रेम करता हूँ ; इस से भी प्रेम करता हूँ और जो इसे प्रेम करता है उसे भी प्रेम करता हूँ|” [हसन और हुसैन रजिअल्लाहुअन्हुमा की विशिष्ठता – सहीह मुस्लिम 2421]

अल्लाह के रसूल के सेवक, अनस बिन मालिक रजिअल्लाहुअन्हु का उल्लेख है : मैंने अल्लाह के रसूल से बढ़कर बच्चों से प्रेम करते हुए किसी को नहीं देखा| आप के बेटे इब्राहीम, मदीना में एक दाई के देख रेख में थे| आप वहाँ पर जाया करते थे और हम भी आप के साथ जाते थे| आप उस घर में प्रवेश करके, बच्चे को उठाते थे और प्यार करते थे| फिर वापस आ जाते| [सहीह मुस्लिम 2316]

 

अभिवादन

जब भी अल्लाह के रसूल बच्चों के पास से जाते, तो पहले आप उन्हें अभिवादन करते, ‘अस्सलामु अलैकुम|’ जब भी सवारी करते तो बच्चों को अपने ऊँट या गधे पर बिठाते थे| [सहीह मुस्लिम 2168]

 

अल्लाह से उनका सम्बन्ध मज़बूत करना

अब्दुल्लाह बिन अब्बास रजिअल्लाहुअन्हु के उल्लेख के प्रकार हमने कहा : एक दिन मैं अल्लाह के रसूल के पीछे था, आप ने मुझसे कहा : “ऐ नवयुवक, मैं तुम्हे कुछ शब्द सिखाता हूँ (सलाह देता हूँ) : अल्लाह से डरो, अल्लाह तुम्हारी रक्षा करेगा| अल्लाह से डरो, अल्लाह को अपने सामने पाओगे| यदि कुछ माँगना है तो अल्लाह से मांगो ; सहायता चाहते हो, तो अल्लाह से चाहो| यदि कोई राज्य सारा मिलकर भी तुम्हे कुछ लाभ पहुँचाना चाहे, तो उतना ही लाभ पहुंचा सकता है, जितना अल्लाह चाहता है| और यदि सब मिलकर तुम्हे कुछ हानि पहुंचाना चाहे, तो उतना ही हानि पहुंचा सकते है जितना अल्लाह चाहता हो| कलम उठालिये गए और पृष्ठ सूख गए|” [जामि तिरमिज़ी vol 4:2516]

 

वह असफल होने पर उन्हें धैर्य दिलाना

अल्लाह के रसूल बच्चों को यह सिखाते थे कि, असफलता है ही नहीं| अनस रजिअल्लाहुअन्हु ने उल्लेख किया : मैं ने अल्लाह के रसूल की सेवा दस वर्ष की| आप ने कभी मुझे ‘उफ्फ’ (नाराज़गी दिखाने वाला शब्द) नहीं कहा| और कभी भी मुझे यह नहीं कहा कि, “तुमने ऐसा क्यों किया या ऐसा क्यों नहीं किया?” [किताबुल अदब, सहीह बुखारी 6038, vol 8:64]

इसी समान हदीस में अनस रजिअल्लाहुअन्हु न उल्लेख किया : “मैं अल्लाह के रसूल की सेवा में नौ वर्ष रहा| और मुझे ऐसी घटना कोई याद नहीं, जिसमे आप ने ऐसा कहा हो : “तुमने ऐसा क्यों किया, और आप ने कभी मेरे काम में कोई गलती नहीं निकाली|” [सहीह मुस्लिम 2309]

हमें अपने बच्चों पर विश्वास रखना चाहिए और उन्हें आगे बढ़ने का पूरा मौका देना चाहिए|

 

अनुचित व्यवहारों को अनदेखी करना

बच्चों के कई अनुचित व्यवहारों को अनदेखी करना चाहिए| आप ने इसका उदाहरण दिया| अनस बिन मालिक रजिअल्लाहुअन्हु ने कहा : “अल्लाह के रसूल का स्वभाव सबमे अच्छा था| एक दिन आप ने मुझे एक काम से भेजा और मैंने कहा, ‘अल्लाह की कसम ! मैं नहीं जाऊँगा|’ किन्तु मेरे मस्तिष्क में था कि, मैं वह काम करूंगा, क्यों कि अल्लाह के रसूल ने मुझे वह काम करने की आज्ञा दी है| मैं जाने लगा और रास्ते में कुछ बच्चों को खेलते हुए देखा| इतने में अल्लाह के रसूल , वहाँ आये और मुझे पीछे से पकड़ लिया| जब मैंने आप को देखा तो आप मुस्कुरा रहे थे| और आप ने कहा, ‘उनैस (अनस का उपनाम), क्या तुम वहाँ गए, जहाँ मैंने तुम्हे जाने के लिए कहा?’ मैंने कहा, ‘ऐ अल्लाह के रसूल , हाँ, मैं जा रहा हूँ|”’ [सहीह मुस्लिम 2310 a, 2309 e]

 

आधार

[1] http://www.farhathashmi.com/articles-section/seerah-and-sunnah/prophet-muhammad/

[2] http://muttaqun.com/children.html

[3] http://islamqa.info/en/20064

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