तौहीद


इस्लाम  हमे हमारे माता पिता के ओर से मिला किन्तु समझने वाली बात यह है की इस्लाम के बारे में हम कितना जानते है ? कितना इस्लाम के बारे में जानना चाहते है ? क्या केवल यही काफी है की जितनी शिक्षा हमे हमारे धर्म के बारे में घर में मिलती है या हमारे समाज में सुनने से मिलती है यही काफी है ? क्या हमे प्राथमिक सूत्र तक जाकर इस्लाम का अध्धयन नहीं करना चाहिए ? बल्की हमको इस्लाम के बारे में ज्ञान खुद भी सीखना चाहिए ।

 

सामग्री या अनुक्रमणिका

 

तौहीद का माना

आइये बात करते है तौहीद की क्यों की इस्लाम में सब से अहेम चीज़ तौहीद है। तौहीद का अर्थ एकीकरण है और यह शब्द " वहद " से आया है और जब यह शब्द इस्लामी शब्दावली में आता है तो इसका मतलब अल्लाह को एक मानना । इस बात को मानना की अल्लाह केवल एक है उसे किसी की ज़रुरत नहीं और हमे उसके सिवा किसी की ज़रुरत नहीं ।

 

तौहीद का कालिमा

हर मुसलमान के लिए इस जुमले या वाक्य को मानना  ज़रूरी है “ला इलाहा इल्लल-लाह” जिस का माना है “नहीं है कोई ईश्वर इबादत के काबिल सिवा अल्लाह के।” इस जुमले को अरबी भाषा में कलिमा ऐ तौहीद कहते है।  और इस जुमले को अल्लाह ने खुरान में कई मुखाम पर इस्तेमाल किया, खुरान सुरह बक़रह नंबर 2:255, सुरह अले इमरान नंबर 3:2, सुरह ताहा नंबर 20:14 इत्यादि।

 

तौहीद की खिसमे

तौहीद को यदि आप विस्तार में जानेंगे तो आप इसे इस प्रकार जान सकते है । तौहीद की तीन खिसमे यह है - 1.तौहीद उर रुबूबियत 2.तौहीद उल अस्मा व सिफात और 3.तौहीदु उल इबादत या तौहीद उल उलूहिया। तौहीद के यह तीन खिसम को खुरान की रौशनी में बाटा गया- खुरान सुरह मरयम नंबर 19:65

 

1.तौहीद उर रुबूबियत

आईये तौहीदुल रबूबियत पर प्रकाश डाले तौहीद उल रुबूबियत : इस सन्दर्भ में अल्लाह को केवल एक मानना एवं उसकी ही अस्तित्व को दुनिया के रचयिता के रूप में मानना । जब किसी बनायीं हुई वस्तु का अस्तित्व नहीं था तब से ही उसका अस्तित्व है। हर चीज़ को बनाने में केवल और केवल अल्लाह ही है । जैसा की खुरान में अल्लाह ने कहा है की " अल्लाह ने ही सब कुछ बनाया और उसकी देख रेख भी वही करता है " खुरान सूरह ज़ुमर नंबर 39 :62 " और कोई आपदा अल्लाह की इच्छा के बिना नहीं आ सकती " खुरान सूरे तगाबुन नम्बर 64:11 और अल्लाह के अंतिम दूत माननीय मोहम्मद (उन पर अल्लाह की सलामती हो ) ने कहा "यदि विश्व के सभी मनुष्य आपको कष्ट देने की चेष्टा करे तो उतनी ही दे सकते है जितनी अल्लाह चाहता है और यदि आपको कुछ लाभ देना चाहे तो भी केवल उतनी ही दे सकते है जितना अल्लाह चाहे " (यह हदीस के शब्द नहीं बल्कि उसका मफहूम है ) यानि सारे लाभ और नुक्सान का मालिक सिर्फ एक अल्लाह है।
इस प्रकरण से हमने यह जाना की सृष्टि का निर्माण , उसको चलाने वाला , किसी को पैदा करना या मौत देना, या किसी मनुष्य को लाभ और नुक्सान , यह सब शुद्ध रूप से अल्लाह ही के द्वारा है एवं उसके अलावा कोई इतनी शक्ति नहीं रखता की किसी मनुष्य को लाभ या नुक्सान पहुचा दे। अल्लाह ने कहा खुरान में कि “हर तारीफ अल्लाह के लिए है जो तमाम जगत का मालिक है।“ खुरान सूरा फातिहा नंबर 1:1

 

2.तौहीद उल अस्मा व सिफात

दूसरी , तौहीद उल अस्मा व सिफात जिसको आप निम्न पांच पक्षों में जाने ।

1) अल्लाह को वेसे ही जानना और मानना है जिस प्रकार अल्लाह और उसके अंतिम दूत ने बताया । इसे एक बात से समझते है की मनुष्य देखता है ,अल्लाह भी देखता है लेकिन अल्लाह केसे देखता है यह हम नहीं जानते हम नहीं कह सकते की अल्लाह इंसान ही की तरह देखा है या उसे देखने के लिए आँखों की ही ज़रुरत है जिसमे रेटिना सही होना चाहिए वास्तव में जो सिफात अल्लाह के है और जो मनुष्य में है (जेसे : देखना , सुनना ) उदाहरण : अल्लाह देखता है एवं इन्सान भी देखता है अल्लाह का देखना उसको किसी का दिया हुआ नहीं है किन्तु मनुष्य का, अल्लाह का दिया हुआ है अल्लाह का देखना इसकी कोई सीमा नहीं ,किन्तु इन्सान एक सीमा में देख सकता है अल्लाह का देखना कभी ख़तम नहीं होगा कित्नु इन्सान का देखना बंद होता है अल्लाह का देखना वेसा नहीं जेसा इन्सान का है ( जेसे इंसान को देखने के लिए आँख की चाहिए ,खुली होनी चहिये , रौशनी होनी चाहिए इत्यादि) ।

 

2) अल्लाह को केवल उन नामो से पुकारना जो अल्लाह ने ही बताये है जेसे हमने ऊपर देखा अल्लाह सुनता है और उसने अपना एक नाम बताया है अल समी यानि सुनने वाला अब हम यह जानते है की अल्लाह गुस्सा करता है लेकिन यह नाम अल्लाह ने खुद को नहीं दिया तो अब हम अल्लाह को अल घादिब (गुस्सा करने वाला) नहीं कह सकते । ज्ञात हुआ की जो अल्लाह ने अपना नाम रखा है हम उसे उसी नाम से पुकार सकते है।


3) अल्लाह को किसी इंसान की किसी सिफत से बयान नहीं कर सकते जेसे कुछ इसाई कहते है की अल्लाह ने 6 दिनों में ब्रहम्मांड बनाया फिर एक दिन उसने आराम किया जबकि अल्लाह कहता है कुरान में की न उसे नींद आती है न वो थकता है खुरान सूरेह ताहा नंबर 20:52 इसी प्रकार भूक प्यास से हम अल्लाह की सिफत बयान नहीं कर सकते।


4) हम किसी मनुष्य को अल्लाह की कोई सिफत नहीं दे सकते, जेसे के ये कहना की वह मानुष मरता नहीं येह कहना सही नहीं।


5) अल्लाह का नाम किसी मनुष्य को नहीं दे सकते जेसे कोई मनुष्य अपना नाम अल्लाह , रहमान , रहीम नहीं रख सकता उसको इन नामो के आगे अब्द यानि बंदा लगाना पड़ेगा(अब्दुल्लाह = अब्द + अल्लाह, अब्दुर्रहमान = अब्दुर + रहमान इत्यादि)।  इसी तरह वो अल्लाह के अलावा किसी और के नाम के आगे अब्द नहीं लगा सकते जेसे अब्दुल नबी , अब्दुल ईसा , अब्दुल मोहम्मद इत्यादि ।

 

3. तौहीदु उल इबादत या तौहीद उल उलूहिया

यह पहलु बोहुत गहराई के साथ समझने का है। तौहीद उल इबादत यानि अल्लाह के सिवा किसी और की इबादत न करना । इबादत सिर्फ नमाज़ ही नहीं बल्की उन तमाम चीजों को कहेंगे जो अल्लाह ने क़ुरान में कहा या जो नबी ने अहादीस में कहा। उदहारण – जैसे की नशा नहीं करना भी इबादत है क्यों की वह मुस्लमान क़ुरान के सुरह मेदः पर अमल कर रहा है , क़ुरान सुरह मेदः नंबर 5:90. रसूल की इतात करना भी इबादत है, खुरान सुरह अले इमरान नंबर 3:31,32, सुरह निसा नंबर 4:65 इत्यादि।

 

निष्कर्ष

अल्लाह ने जितने भी संदेशवाहक(Messengers) इस ज़मीन पर भेजा उन तमाम का यही पैघाम या सन्देश था की एक अल्लाह को मानो और उसी की इबादत करो और अंतिम दूत आदरनिय पैग़म्बर मुहम्मद(उन पर अल्लाह की सलामती बनी रहे) का भी यही सन्देश था।

 

संदर्भ

http://www.askislampedia.com/en/wiki/-/wiki/English_wiki/Introduction+to+ISLAM

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