कलमए शहादत


"शहादत" यह अराबी भाषा का शब्द है, इसका अर्थ है "गवाही देना" अर्थात यह गवाही देना कि अल्लाह (सुब्हानहु तआला)एक है और मुहम्मद (सललेल्लाहु अलैही वसल्लम)उसके रसूल हैं। यह कालिमा इस्लाम धरम की बुनियाद है, इसी कालिमा पर इस्लाम के सभी अख़ाइदया यक़ीन, कार्यों तथा अधिनियमों की नीव रखी जाती है। कलमए शहादत के दो भाग हैं,

 

(१): अल्लाह सुब्हानहु तआला को एक जानना (जिसको कलमए तौहीद कहते है)

 

(२): मुहम्मद (सललेल्लाहु अलैही वसल्लम) को रसूल मानना (कलमए रिसालत कहते है) । 

 

सामग्री या अनुक्रमणिका

 

शहादत के शब्द

कलमए शहादत इस्लाम का पहला स्तम्भ है, (सहीहुल बुखांरी:८ ), कलमए शहादत के दो भाग हैं जिसे शहादतैन भी कहा जाता है अर्थात दो गवाहियाँ।

 

पहली गवाही: "अशहदु अल ला इलाहा इल लल्लाह" (मैं गवाही देता हूँ कि अल्लाह सुब्हानहु तआला के सिवा कोई इबादत(पूज्ये) के योग्य नहीं, "व अशहदु अन्ना मुहम्मदर रसूलअल्लाह " (और मैं गवाही देता हूँ कि मुहम्मद सललेल्लाहु अलैही वसल्लम अल्लाह के रसूल हैं।

 

गवाही का पहला भाग

(अ): ला इलाहा इल लल्लाह के स्तम्भ :

अल्लाह ताला की तौहीद का प्रतिश्रुति(इखंरार) करना, इसमें दो चीजें सम्मिलित हैं,

 

इसबात(सबूत देना) एवं नफ़ी(नकारना, इनकार करना), और यही इस भाग के दो स्तम्भ भी हैं, 

 

स्तम्भ:(१).नफ़ी(नकारना,इनकार करना): ला इलाहा :(कोई इबादत(पूज्ये) के योग्य नहीं), इस बात का इनकार करना कि कोई इबादत(पूज्ये) के योग्य नहीं है।

 

इसबात(सबूत देना) : इल लल्लाह : (सिवाए अल्लाह सुब्हानहु के) , इस बात का सबूत देना कि एकाकी अल्लाह सुब्हानहुतआला ही इबादत(पूज्ये) के योग्य है। और इस पर ईमान या भरोसा लाना ।

 

(आ): ला इलाहा इल लल्लाह की शरतें:

ला इलाहा इल लल्लाह की ८ शरतें हैं, जिसका ग्यान प्राप्त करना अतिआवशयक है, और वो ये हैं।


(९): ग्यान: नफ़ी तथा इसबात के साथ इस कालिमा के अर्थ एवं संकल्पना का भी ग्यान हो जो कि अज्ञान के विपरीत है,


(२): यख़ीन:ऐसा ईमान जिसकी बुनियाद वह ग्यान हो जो किसी भी प्रकार के शक तथा सोच से परे हो,


(३): इख़लास(पूर्णता एवं सत्यता):इस कलिमे के प्रति पूर्ण विश्वास हो एवं इसके प्रतिश्रुति(इखंरार) में खरा हो,


(४): सिदक़(सच्चाई):इस कालिमा को कहने मे सच्चाई हो जो झूट के विपरीत है,


(५): मुहब्बत(प्रेम):इस कालिमा से तथा इसके माने से प्रेम करना और इससे खुश होना,


(६): इनख़ियाद(आज्ञाकारी):इस कालिमा और इसके आवश्यकताओं के प्रति आज्ञाकार होना,


(७):ख़ुबूल(स्वीकार करना):येह कालिमा जिस चीज़ की आवश्यकता करता होउसे मन एवं ज़बान के साथ स्वीकार करना,


(४): ताग़ूत के साथ कुफ़र (इनकार):अल्लाह सुब्हानहु तआला के सिवा वे सभी जन एवं वस्तुएं  जिनकी इबादत(पूजा)की जाती है ताग़ूत कहलाते हैं इस कालिमा की शर्त है कि इन सभी प्रकार के ताग़ूत का इनकार किया जाए, अल्लाह (सुब्हानहु तआला) के सिवा सारे झूटे माबूद(जिनको पूजा जाता है) एवं मुता(जिनकी आज्ञाकारी की जाति है) को नकारना।

 

शहादत का दूसरा भाग

"मुहम्मद रसूलुल्लाह" अर्थात इस बात पर ईमान रखना कि मुहम्मद सललेल्लाहु अलैही वसल्लम अल्लाह सुब्हानहु तआला द्वारा भेजे गए अंतिम रसूल हैं, और इबादत का वही ढंग या तरीखा मानने के योग्य है जो मुहम्मद (सललेल्लाहु अलैही वसल्लम) के लाए हुए ढंग एवं उनके दिखाए गए आदर्श से मिलता हो ।

 

इस गवाही का अर्थ

(१): मुहम्मद सललेल्लाहु अलैही वसल्लम के हर आदेश का पालन करना, उनके प्रति आज्ञाकार होना,


(२): जिन बातों से मुहम्मद सललेल्लाहु अलैही वसल्लम ने मना किया उनसे रुक जाना,


(३): अल्लाह सुब्हानहु तआला की इबादत(पूजा) मुहम्मद सललेल्लाहु अलैही वसल्लम के बताए हुए ढंग पर करना,


(४): वह सारी बातों जिनकी मुहम्मद सललेल्लाहु अलैही वसल्लम ने ख़बर(सूचना) दी उनको सच मानना एवं उन पर ईमान लाना,


(५): मुहम्मद सललेल्लाहु अलैही वसल्लम अल्लाह के बंधे और अल्लाह की इबादत करने वाले है और मुहम्मद सललेल्लाहु अलैही वसल्लम की इबादत नहीं की जाएगी ।

 

और देखये

अल्लाह सुब्हानहु तआला;मुहम्मद सललेल्लाहु अलैही वसल्लम;इस्लाम के स्तम्भ;सलाह; ज़कात; रोज़ा;  hajj ; इल लल्लाह की शरतें, इबादत और अन्य ।

 

संदर्भ

शरह उसूलुल ईमान: अश-शेख़ मुहम्मद बिन सालेह अल-उसय्मीन

 

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