अल्लाह सुब्हानहु तआला के अधिकार (हम बन्दों(भक्तों) पर)


अल्लाह सुब्हानहु तआला ने एकमात्र विश्व ब्रह्माण्ड की सृष्टि की, सारे प्राणियों को अस्तित्व दिया और एकाकी ही पूरी सृष्टि का निर्माण किया, उसने ना केवल हमारी सृष्टि की बल्कि धर्म और संसार की  सम्पूर्ण आवश्यकताऐं भी प्रदान कीं एवं अनगिनत सुखद वस्तुओं(नअमतों) से सम्मानित किया तथा उसकी सर्वश्रेष्ठ कृपा तो यह है कि उसने हमारे मार्गदर्शन के लिये रसूलों को भेजा और उनके माध्यम से सारी धार्मिक वस्तुएं सिखलाई एवं विशेष रूप से हम मनुष्यों को ऐसी ऐसी विभिन्न वस्तुओं से  सम्मानित किया जिसकी हम गिनती भी नहीं कर पाए गें जैसे अल्लाह सुब्हानहु तआला कहते हैं। "और  जो कुछ तुम ने माँगा सब में से तुमको दिया यदि तुम अल्लाह के कृपादृष्टि(अहसान) को गिनने लगो तो गिन नहीं पाओगे(मगर लोग सुखद वस्तुओं(नअमतों) के आभारी नहीं होते) निसंदेह मनुष्य बड़ा ही अन्यायी एवं कृतघ्न है" (इब्राहीम ;३४),और कहते हैं "अल्लाह सुब्हानहु ने तुम्हें तुम्हारी माओं के पेट से इस दशा में निकाला कि तुम कुछ जानते ना थे, उसने तुम्हें कान आँखें एवं दिल दिये ताकि तुम कृतज्ञता करो" (सूरा नह्ल : ७८) हम मनुष्यों का रोआँ रोआँ उसका उपकृत(अहसानमंद) है इसीलिये हम मनुष्यों को चाहिए कि अपने निर्माता को पहचाने उसके अधिकारों को पहचाने केवलउसी की आराधना करे उसके आदेशों का पालन करें बस वही करे जिसकी वह हमें आज्ञा देता है, जिससे रोकता है रुक जाए क्यूंकि वह विधाता है आवश्यकताओं एवंकामनाओं को पूरा करने वाला है एवं ना ही वह हमसे कुछ चाहता हैउसे किसी चीज़ की आवश्यकता नहीं । 

 

सूचि

 

अल्लाह सुब्हानहु तआला के अधिकार

वैसे तो अल्लाह सुब्हानहु तआला के अपने बन्दों(भक्तों) पर कई अधिकार हैं परंतु हम यहाँ कुछ महत्वपूर्ण और विशेष अधिकार ही निम्नलिखित करे गें।

 

अल्लाह सुब्हानहु तआला का परिचय

हम मनुष्यों के लिये आवश्यक है कि हम अपने विधाता को पूर्ण रूप से जाने एवं यह ३ चीज़ों पर निर्भर करता है,

 

(१). अल्लाह सुब्हानहु तआला का परिचय:अर्थात अल्लाह सुब्हानहु तआला ने जो कुछ भी अपनी किताब(क़ुरआन) में अपने सम्बंधित बताया तथा मुहमम्द सललेल्लाहु अलैही वसल्लम(इनपर अल्लाह की रहमत ओर सलामती हो) ने अपनी सुन्नत(हदीस) में जो अल्लाह सुब्हानहु के सम्बंधित बताया उसका ज्ञान प्राप्त करना,

 

(२). अल्लाह सुब्हानहु तआला के गुणों का परिचय:अर्थात अल्लाह सुब्हानहु तआला ने अपनी किताब(क़ुरआन) में जो आपने गुण बताए तथा मुहमम्द सललेल्लाहु अलैही वसल्लम(इनपर अल्लाह की रहमत ओर सलामती हो) ने अपनी सुन्नत(हदीस) में जो अल्लाह सुब्हानहु के गुण बताए उसका ज्ञान प्राप्त करना,

 

(३). अल्लाह सुब्हानहु तआला के अधिकारों का परिचय: अर्थात अल्लाह सुब्हानहु तआला ने अपनी किताब(क़ुरआन) में जो आपने अधिकार(बन्दों के प्रति) बताए तथा मुहमम्द सललेल्लाहु अलैही वसल्लम(इनपर अल्लाह की रहमत ओर सलामती हो) ने अपनी सुन्नत(हदीस) में जो अल्लाह सुब्हानहु के अधिकार(बन्दों के प्रति)बताएउसका ज्ञान प्राप्त करना।

 

अल्लाह सुब्हानहु तआला पर ईमान

अल्लाह सुब्हानहु तआला पर ईमान(पूर्ण विश्वास) रखना एवं यह ३ बातों  पर निर्भर करता है,

(१).अल्लाह सुब्हानहु तआला के अस्तित्व पर ईमान(पूर्ण विश्वास) रखना है,

(२). अल्लाह सुब्हानहु तआला के एकमात्र रब(Lord) होने पर ईमान(पूर्ण विश्वास) रखना है,

(३).अल्लाह सुब्हानहु तआला के एकमात्र पूज्ये(इबादत) के योग्य होने पर ईमान(पूर्ण विश्वास) रखना है,

(४). अल्लाह सुब्हानहु तआला के नाम एवं गुणों पर ईमान(पूर्ण विश्वास) रखना है।

 

अल्लाह सुब्हानहु तआला की आराधना (worship)

अल्लाह सुब्हानहु तआला पर ईमान लाने के बाद उसका श्रेष्ठ एवं महान अधिकार यह है कि केवल उसी की आराधना की जाए एवं उसकी उपासना में किसी को  साझी न ठहराया जाए न किसी नबी न किसी वली(सन्त) एवं न ही किसी अन्य जीव को एवं न ही किसी वस्तु को, जैसे अल्लाह सुब्हानहु तआला कहते हैं " यह सब इसलिये कि अल्लाह सुब्हानहु तआला ही सत्य है एवं उसके सिवा जिसे भी ये पुकारते हैं असत्य है और निसंदेह अल्लाह सुब्हानहु तआला ही सर्वोच्च एवं श्रेष्ठता वाला है।"(अल हज :६२ )

 

हदीस:

मआज़ इब्ने जबल रज़ियल्लाहु अन्हु(अल्लाह इन से प्रसन्न हो) सूचित करते हैं कि मैं मुहमम्द सललेल्लाहु अलैही वसल्लम(इनपर अल्लाह की रहमत ओर सलामती हो) के पीछे एक गधे पर सवार था, मुहमम्द सललेल्लाहु अलैही वसल्लम ने कहा "अए मआज़ क्या तुम जानते हो कि अल्लाह के  उसके बन्दों(भक्तों) पर क्या क्या अधिकार हैं और बन्दों(भक्तों) का अल्लाह पर क्या क्या अधिकार हैँ तो मैंने कहा: अल्लाह और उसके रसूल श्रेष्ठ जानते हैं तो मुहमम्द सललेल्लाहु अलैही वसल्लम ने कहा" अल्लाह का अधिकार उसके बन्दों(भक्तों) पर यह है कि वे केवल उसी की उपासना करें और उसके साथ किसी को साझी न ठहराएँ, और बन्दों(भक्तों) का अधिकार अल्लाह पर यह है कि जिस बन्दे(भक्त) ने अल्लाह सुब्हानहु के साथ किसी को साझी न बनाया उसे पीड़ा न दे" (सही बुख़ारी : २८५६, सही मुस्लिम :३०)अल्लाह सुब्हानहु के इस अधिकार की मांग यह है कि केवल उसी की उपासना की जाए सभी प्रकार की पूजा केवल उसी के लिए विशेष हो,एवं उसके साथ किसी को साझी ना बनाया जाए,

 

आराधना ५ प्रकार की होती है :

(१). वह आराधनाएं जिनका संबंध मन से होता है उदाहरण के तौर पर स्नेह, भय, आशा, विश्वास एवं अन्य,

(२). वह आराधनाएं जिनका संबंध शरीर से होता है उदाहरण के तौर पर नमाज़ रोज़ा तवाफ़ एवं अन्य,

(३). वह आराधनाएं जिनका संबंध हमारे धन से होता है उदाहरण के तौर पर दान, बलिदान एवं अन्य,

(४). वह आराधनाएं जिनका संबंध हमारे शरीर एवं धन दोनों से होता है उदाहरण के तौर पर हज एवं अन्य,

 

इस्लामी विद्वान कहते हैं कि अल्लाह सुब्हानहु की आराधना इस प्रकार की जाए कि उस में स्नेह, भय, आशा एवं विश्वासचारों का सम्मिलन हो अर्थात उससे स्नेह हो ताकि उसकी आराधना भक्ति से कर पाएं, उसका भय भी हो जो हमें बुराई से रोके एवं उसकी आराधना की ओर आकर्षित करे, उससे आशा भी हो कि हम जो कुछ उसके लिये कर रहे हैं वह हमें उसका अछा परिणाम देगा एवं स्वर्ग में जाने की आशा तो प्रत्येक मुस्लमान को रखनी चाहिये एवं उसपे पूर्ण विश्वास हो कि वह जो कुछकहता है वही करेगा हमारी प्रार्थनाओं को सुनेगा एवं स्वीकार करेगा, हमें हर पीड़ा से बचाए ग। अंत में अल्लाह सुब्हानहु तआला से से प्रार्थना है कि अल्लाह सुब्हानहु हमें सदैव ईमान पर रखे हमारी प्रार्थनाओं को स्वीकार करे हमारी आराधनाओं में स्वच्छता एवं शुद्धि दे। (आमीन या रब्बुल आलमीन)

 

और देखिये

अल्लाह पर ईमान, तौहीद, शिर्क, अल्लाह की रहमत, सुन्नत, बिदअत और अन्य

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