अंसार


सहाबा में दो तरह के लोग थे, मुहाजिर और अंसार| अंसार का अर्थ होता है, मदद करने वाले| यह लोग इस्लाम के लिए अल्लाह की तरफ से दी गयी बहुमति है| इन लोगों का त्याग और विश्वास बहुत अद्भुत था| मुसाब इब्न उमैर रजिअल्लाहुअन्हु ने जैसा ही इन लोगों के सामने अल्लाह के आयात (वचन) का पठन किया, यह लोगों ने तुरंत इस्लाम स्वीकार कर लिया और अल्लाह के रसूल मुहम्मद को अपने शहर मदीना आने का निमंत्रण दिया|   

 

अंसार को अपना वादा निभाना मालूम था| वह लोग त्याग अथवा क़ुरबानी की एक नया उदाहारण स्थापित किये| उन्होंने अपने मुहाजिर (मक्का से प्रवास करने वाले) भाईयों का दिल से स्वागत किया और उन्हें अपने संपत्ति में भी भाग दिया| वह असली नायक थे, क्यों की उन्होंने अल्लाह के रसूल मुहम्मद   को हर तारीखे से यानी धन, प्राण से सहायता की| अंसार मदीना के लोग थे| उन लोगों ने अल्लाह के रसूल मुहम्मद से नुस्रह (धन की सहायता) और बयाह (निष्ठा की कसम) की थी| [1]

 

विषय सूची

 

खुरआन

 “तथा प्रथम अग्रसर मुहाजिरीन और अन्सारी, और जिन लोगों ने सुकर्म के साथ उन का अनुसरण किया अल्लाह उन से प्रसन्न हो गया| और वे उस से प्रसन्न हो गए| तथा उस ने उन के लिए ऐसे स्वर्ग तैयार किये है जिन में नहरे प्रवाहित है| वह उस में सदावासी होंगे, वही बड़ी सफलता है|” [खुरआन सूरा तौबा 9:100] [2]   

 

“तो यदि वह तुम्हारे ही समान ईमान ले आये, तो वह मार्गदर्शन पा लेंगे....|” [खुरआन सूरा बखरा 2:137] [3]

 

हदीस

घैलान बिन जाबिर रजिअल्लाहुअन्हु ने कहा : मैंने अनस रजिअल्लाहुअन्हु से पुछा : “मुझे अंसार के नाम के बारे में बतायिये; क्या आपने स्वयं यह नाम रख लिया या अल्लाह ने यह नाम रखा?” उन्होंने कहा : “अल्लाह हमें इस नाम से बुलाया|”  हम बसरा में अनस रजिअल्लाहुअन्हु के पास जाया करते थे और वह हमें अंसार के कर्म और विशिष्ठता बताते थे| वह मुझे या किसी अल अजद जाती के व्यक्ति को संबोधित करते हुए कहते थे, “तुम्हारी जाती ने उस समय, वह कार्य किया|” [सही बुखारी 3776]

 

अल बरा रजिअल्लाहुअन्हु ने कहा : मैंने अल्लाह के रसूल मुहम्मद   कोऐसा कहते हुए सुना : “विश्वासी (मोमिन) के सिवा कोई अंसार से प्रेम नहीं करता, और कपटी (मुनाफ़िक़) के सिवा कोई उन से द्वेष नहीं करता|” इसलिए अल्लाह उन्हें प्रेम करता है जो उनसे (अंसार से) प्रेम करते है और उन्हें द्वेष करता है जो उनसे (अंसार से) द्वेष करते है|” [सही बुखारी 3783, सही मुसलिम 75]    

 

अनस बिन मालिक रजिअल्लाहुअन्हु ने कहा : अल्लाह के रसूल मुहम्मद   ने ऐसा कहा : “अंसार से प्रेम करना विश्वास (ईमान) की निशानी है और उनसे द्वेष करना कपटता (निफ़ाक़) की निशानी है|” [सही बुखारी 3784] [4]

 

अंसार का त्याग

 “तथा उन लोगों के लिए (भी) जिन्होंने आवास बना लिया इस घर (मदीना) को तथा उन (मुहाजिरों के आने) से पहले ईमान लाये, वह प्रेम करते है उन से जो हिजरत करके आ गए उन के यहाँ| और वे नहीं पाते अपने दिलों में कोई आवश्यकता उस की जो उन्हें दिया जाये| और प्राथमिक्ता देते है (दूसरों को) अपने ऊपर चाहे स्वयं भूके हो| और जो बचा लिए गए अपने मन की तंगी से, तो वही सफल होने वाले है|” [खुरआन सूरा हशर 59:9] [5]     

                                                                                                                                                                            


जब प्रवासी (मुहाजिर) मदीना पहुँच गए, तब अल्लाह के रसूल मुहम्मद ने अब्दुर रहमान रजिअल्लाहुअन्हु और साद बिन अररबी रजिअल्लाहुअन्हु के बीच भाई चारा स्थापित किया| साद रजिअल्लाहुअन्हु ने अब्दुर रहमान रजिअल्लाहुअन्हु से कहा : “मैं सब अंसार में धनवान हूँ| इसलिए मैं अपनी सम्पत्ती को (हम दोनों के बीच) बाँटना चाहता हूँ| मेरे पास दो पत्नी है, उन में से तुम्हे जो पसंद है, मैं उसको तलाक दे दूंगा, ताकि तुम तलाक की इद्दत (समय) पूरा होने के बाद तुम उस से विवाह कर सको|”  तब अब्दुर रहमान रजिअल्लाहुअन्हु ने कहा, “अल्लाह तुम्हारे परिवार में और सम्पत्ती में समृध्धि प्रसाद करे|” [सही बुखारी 3780] [6]

 

मुहाजिर और अंसार एक दूसरे के सहायक थे

सहाबा में दो ग्रोह है| एक मुहाजिरीन, जो अपने घर बार छोड़कर अल्लाह के रसूल मुहम्मद के साथ प्रवास किये, ताकि अल्लाह का दीन स्थापित हो| यह वे लोग अल्लाह जो अल्लाह की राह में अपने धन तथा प्राण अर्पित किये| दूसरा ग्रोह अंसार का है| यह लोग इस्लाम स्वीकार करने वाले मदीना के वासी है| इन लोगो ने अपने मुहाजिर भाईयों को अपने घर में पनाह दी और अपनी सम्पत्ती से उनकी सहायता की| यह लोग मुहाजिरीन के साथ मिलकर कई युध्ध किये और इस तरह अल्लाह और अल्लाह के रसूल मुहम्मद की राह में अपना समर्थन दिया| मुहाजिर और अंसार दोनों एक दूसरे के समर्थक थे| अल्लाह ने अपनी किताब खुरआन में कई जगह मुहाजिर और अंसार की प्रशंसा की| उदहारण के लिए – “अल्लाह ने नबी तथा मुहाजिरीन और अंसार पर दया की, जिन्हों ने तंगी के समय आप का साथ दिया, इस के पश्चात कि उन में से कुछ लोगों के दिल कुटिल होने लगे थे| फिर उन पर दया की| निश्चय वह उन के लिए अति करुणामय दयावान है|” [खुरआन सूरा तौबा 9:117] [7]  

 

आधार, हवाला

[1] http://www.islamweb.net/emainpage/index.php?page=articles&id=168373 (english)

[2] http://quran.com/9/100 (english)

[3] http://quran.com/2/137 (english)

[4] http://www.sunnah.com/bukhari/63#1 (english)

[5] http://www.islamweb.net/emainpage/index.php?page=articles&id=168373 (english)

[6] http://www.sunnah.com/bukhari/63#1 (english)

[7] http://www.qtafsir.com/index.php?option=com_content&task=view&id=1377&Itemid=63 (english)

491 दृश्य
हमें सही कीजिये या अपने आप को सही कीजिये
.
टिप्पणियाँ
पृष्ठ का शीर्ष